शनिवार, 27 दिसंबर 2014

असम




असम के बारे में न्यूज़ देखते देखते मन रुआँसा हो गया। कौन है यह बोडो ? क्यों चाहिए बोडो लैंड ?
कितने नरसंहार और कब तक ? इन लोगों की आत्मा जागती नहीं ? क्या यह मनुष्य नहीं ? क्या गरीबी मूल कारण  है ? या निरक्षरता या बेरोजगारी या कोई कलुषित राजनीति ? 
एक रणवीर सेना भी हुआ करती थी , ताबड़तोड़ गोलियाँ , कुछ दिन अखबारों की सुर्खियां फिर एक और काले दिन का इंतज़ार । 
अब इतने कलियट तो हो गए है कि पहचानना भी मुश्किल। 
अब तो काली स्याह रात को भी पीछे छोड़ दिया, दानवों । 

- निवेदिता दिनकर 
  २७/१२/२०१४     
तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से "अलमस्त" , लोकेशन भीमताल 

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

कभी-कभी

 
कभी कभी ख़ुशी का कारण भी बनना, कितना सुखदायक होता है, न। 
आज फूटपाथ पर फेरी लगाकर बैठने वाले से जब मैंने ऊनी दस्ताने ख़रीदे या जब पैसे देने की जगह उस पतले दुबले मुरझाये को खाना खिलवाया या जब संतरे वाले के कहने मात्र पर जबरदस्ती संतरे खरीदे। . 
वैसे कहीं कुछ ख़ास तो नहीं हुआ सिवाय उन लोगों के चेहरें की चमक को छोड़ कर। 
ऐसी कड़ाके की सर्दी में गरम गुलाबजामुन सी गरमाहट बड़ी सोणी लगती है.... 

- निवेदिता दिनकर
  25/12/2014

तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से क्रिसमस ट्री लोकेशन 'अपना घर'

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

धुंध


धुंध से फैलती नारंगी रौशनी
सचमुच 
कितनी तिलस्मी, 
कितनी अपरूप,  
कितनी कातिलाना, 
मानों 
तेरे प्यार की सुलगती खुशबू 
मेरे साँसों में आ जा रही है  … 
उफ्फ, 
आज की रात !
आज की ठंडी रात !!

- निवेदिता दिनकर
  २४/१२/२०१४  

तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से 'धुंध भरी रात' लोकेशन आगरा 

रविवार, 21 दिसंबर 2014

यायावरी







नौकुचियाताल, तुम बहुत खूबसूरत हो।
तुम्हारे आगोश में बिताये हमारे पल निहायत  सुकून भरे थे। मैंने तुम्हे किसी ख़ास वजह से चुना और तुम मेरे सही मायनों में खासम ख़ास निकले। शांत झील से निकलती गुदगुदी  एवं अठखेलियां खेलती यादें मुझे आज भी अपनी तरफ खीच रही है। 
चारो तरफ पहाड़ियाँ हरियाली में नहाई हुई और शुरुआती सर्दी का गुलाबी जामा के बस कहने ही क्या। 
जीने की चाह और बढ़ गई और वादा कि तुमसे मैं पिया संग फिर मिलने आउंगी …  

- निवेदिता दिनकर 




बुधवार, 17 दिसंबर 2014

आक्रोश




कल जो पीड़ा से गुजरी, आज आक्रोश से गुजर रही हूँ...

क्रूर जानवर भी नहीं कर सके ऐसी बर्बरता,
जघन्यता को लांघ चुकी ऐसी कायरता,
जानवर कहकर जानवरों को नहीं कर सकते कलंकित …
कौन से सुरंग में आखिर जा रही यह मानवता।

- निवेदिता दिनकर
  17/12/2014

फोटो मेरे द्वारा कैमरे में कैद "छुट्टी के दौरान स्कूल से निकलते बच्चें ",  लोकेशन भीमताल  

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

सोच

कोई सूरत पसंद करे 
या न करे,
अनदेखा करें ,
बातों का भूचाल बनाये,  
बात बात पर नाक भौह सिकोड़े,  
गया बीता  साबित करे ,
रक्त रंजित …  
कभी कभी 
अस्तित्व विहीन भी  … 
जैसे 
कोख से पैदा न होकर,
कोई बेच गया था  …  
या 
लहरतारा  ताल से  …  
मगर   
फिर भी,
फिर भी 
कँटिले गुच्छो में जमे हुए है। 
बिन थके पिले पड़े है। 
 क्योंकि अब 
डर नहीं लगता, 
सिहरन भी नहीं होती, 
दर्द का दम जो घोंट दिया …  
    
- निवेदिता दिनकर
 ०८/१२/२०१४

 फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर 

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मकड़ जाल


वर्तमान के गर्भ से … 
बस सोचती रह जाती हूँ, अपने काम काज के बीच, जैसे ही निपटाउंगी, वैसे ही कुछ लिख डालूंगी । 
पता नहीं, कब से। 
आज कल पहले से ज्यादा जीने की कोशिश करती हूँ और करती भी रहूंगी। सारी बातें एहसासों पर खूब है, जिंदगी को रवानी देने के लिए। पर कहीं न कहीं बाहर निकल कर आ पाने में असमर्थ  हूँ । कई बार दिशा भ्रम सी नौबत कह कर तसल्ली भी  दे देती हूँ । 
मिथ्या ही हँसती हूँ, मगर यह सूनी आँखे हमेशा धोखा दे जाती है। काजल लगाकर सुन्दर कजरारी भी किया तो थोड़ी देर साथ दिया पर उन नमकीन पानी ने साथ छोड़ दिया जो आँखों से उछल कर बाहर आ गए। थोड़ा ठहर जाते, तो क्या बिगड़ जाता।
पीछे छूट रहे पल असहाय से दूर होते जा रहे है। मन की नदी सूख न जाए कहीं। समय का जानलेवा जबड़ा कभी भी टूट पड़ सकता है।     
रोज़ ढेर सा लिखने को। उँगलियों पर गिनती हूँ और मुस्करा देती हूँ। शीत के बाद बसंत, फिर गर्मियां और फिर बरसात, निरंतर बैचेनी तो बनी रहेगी।         

- निवेदिता दिनकर 
  २९/११/२०१४ 
फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

आखेट


दिनदहाड़े, 
या रात का सन्नाटा  … 
किवाड़ों के पीछे, 
या खुला आँगन … 
चकाचौंध रौशनी,  
या बंद दरवाज़ा …   
स्कूल, 
कॉलेज, 
दफ्तर,
अस्पताल  ... 
असीमित दायरा ...

भेद दो,  
फाड़ दो, 
क्योंकि 

तुम मेरे आखेट हो।   
सिर्फ आखेट॥ 

- निवेदिता दिनकर
  १८/११/२०१४  

फ़ोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर "बरसात की एक रात " लोकेशन - दिल्ली 

बुधवार, 12 नवंबर 2014

अंतर्नाद


सुनकर मेरे हसीं ख्वाब …
मखमली साया,
आँखों की प्यास,
कमलिनी कामना,
मन की परी,
बोली …
ले चल दूर कहीं,
आम बागानों
से होते हुए,
दरिया से सटे हुए …
झिलमिल तारों
के छाँव,
तरुण यशस्वी भाव …
बस
मैं
और
मेरा अंतर्नाद।
लिए
रजनीगंधा सी सौगात॥
तो
ख़्वाबों की झोली यूँ ही सजती रहेगी …
यूँ ही सजती रहेगी …

- निवेदिता दिनकर

फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर " झिलमिल "

सोमवार, 3 नवंबर 2014

पारिजात





"पारिजात"


बचपन से 'शिउली' से संपर्क है, सुबह उठकर जब चुनती थी तो कुछ रिश्ते भी बुनती थी और अब प्रगाढ़ता की ओर ...
कुछ रंग और खुश्बू बिखेरने की कोशिश किया है हमने भी, शुक्रिया शुक्तिका प्रकाशन !!


निवेदिता दिनकर    

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

गुस्ताख़ याद



तुम्हारे साथ बिताये पल ही लागे मुझे रौशनी, 
गुज़ारिश … 
इन गुस्ताख़ यादों के कैद से आज़ाद न करना कभी॥ 


- निवेदिता दिनकर

तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से "अद्भुत रौशनी "

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

दाह संस्कार


जब पहुँची 
घाट … 
नहा धोकर 
चन्दन सी,  
रेशमी साड़ी में लिपटी …   
बेलें की कलियों के गजरें,
खास मेरी पसंद के, 
जवाकुसुम दमक … 

पर, आज …    
भीगी-भीगी कच्ची मिट्टी,
नथुनों में सौंधी खुशबू  … 
नरम नरम बाताश का लेप, 
वेदमंत्र … 
और कुछ 
सुबकियाँ … 

- निवेदिता दिनकर 
   १७/१०/२०१४ 

फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर "जवाकुसुम दमक"
  

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

व्रत


आज तुम पास नहीं थे। लेकिन टेक्नोलॉजी की वजह से एक दूसरे से मुलाक़ात और बातचीत हो गई और इस प्रकार कब पच्चीस वे सालगिरह के नजदीक पहुँच गए …   
यों तो कभी तुमने करवाचौथ का व्रत रखने के लिए भी जोर नहीं दिया मगर अपनी तसल्ली और अपने को आँकने के लिए कोशिश जरूर करती हूँ॥       

बिन व्रत  
तुम्हें पाया।  
अब 
व्रत कर
अपने को 
पाने की 
कोशिश में … 

कितनी सगी, 
कितनी जटिल …  
कितनी उचित, 
कितनी खुदगर्ज़ …   
कितनी अभिमानी,
कितनी स्वार्थी …  
कितनी अपनी,
कितनी अपनों की …   

लगा कर 
कितने जोड़, 
कटौती …    
गणित,
विज्ञानं, 
अर्थशास्त्र … 
बन भी पाई 
कोई
आधी अधूरी अस्तित्व ?
थाह लेना जरूरी है॥ 

-  निवेदिता दिनकर 
    ११/१०/२०१४ 

फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर 

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

देवी


देखो,
कैसी सजी धजी, 
मुस्कराहट की चादर ओढ़े,
चलती फिरती,  
आलीशान  घरों में …  
दुबकी 
सहमी 
फीकी 
पीली  
"देवी''  
न, गलत मत समझना! 
शरीर पर एक दाग नहीं,
मगर …   

- निवेदिता दिनकर
  ०८/१०/२०१४  

दुर्गा माँ की तस्वीर उर्वशी दिनकर द्वारा खींची गई  

बुधवार, 24 सितंबर 2014

कविता


फिसलती रेत सी,
घुमड़ती बादल सी …
कभी मायावी,
कभी भूखी …
कभी खामोश इंतज़ार,
कभी चुप्पी उजागार …
कभी तिल तिल दाह,
कभी चल चल राह…
दर्द की ओढ़नी ओढ़े
छिपती छिपाती …
तो कभी गर्म लावा
सी धौकती …

अब कितना हिसाब रखूँ
तुम्हारा !!

- निवेदिता दिनकर
  २४/०९/२०१४


नोट - उपरोक्त तस्वीर 'उर्वशी दिनकर' के कैमरें से। "मकड़ी के जाल में कैद सूखे पत्ते "   

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

c

एक बार फिर …  
हरी घास मुरझाई पड़ी है,
पंखुरियाँ धीरे धीरे झड़ने लगी है, 
देखो, मौसम भी अब मौसमी नहीं रहा
ठण्ड भी ज्यादा कहाँ पड़ती है ?   
सबकी सब गौरेया न जाने कहाँ चली गयी  … 
इलाहाबादी अमरुद का पेड़, 
ओह, सूख गई टहनियाँ  
और 
कच्चा अमरुद, मीठा भी नहीं रहा …  
यह 
रुआंसा आम का पेड़.…  दो एक साल रूक रूक कर फल देता,   
अरे हाँ, वह देखो जंगली गुलाबी गुलाब का झाड़,
रात की रानी,
गेंदे के फूल और पत्तिया, 
किसी को चोट लगती 
बस पत्तियों को रगड़कर लगा देते … 
खट्टी मीठी इमली,
लाल इमली भी, 
इक्कड़ दुक्कड़, टिप्पी टिप्पी टॉप 
तपती धूप की मीठी तपन  …   
बिजली के जाने पर खुश क्यों होते ? 
डायना, फैंटम, मैंड्रेक्स का इंद्रजाल  
साथ नमक अजवायन के परांठे का थाल  … 
सुर्ख नारंगी आसमान
सा खुल कर,
दूर तक 
जी जाना  … 

आज कहाँ कहाँ से गुजरी ... 
एक बार फिर …  

- निवेदिता दिनकर  

तस्वीर मेरे द्वारा खींची गई , मदुरई के एक फार्म में जहाँ नारंगी शाम मिली  ...

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

तमिलनाडु



दक्षिणी भाग, दक्षिण भारत। अपूर्व, अस्वाभाविक सुन्दर। बहुत सुखद एवं तलों तक समां जाने वाली। यों तो कई बार आई हूँ परन्तु इस बार कुछ नया नया लगा, 'क्या', ये तो पता नहीं  … लोग, ज़मीन, रहन सहन, दुकानें, हलचल, खानपान या आबोहवा। 
कई बार भाषा आड़े आई, मगर थोड़ी देर के लिए। शहर का निर्माण हो या खेतों में फसल, चेन्नई का आकर्षण या महाबलीपुरम का समुद्री तट या मदुरई का मीनाक्षी अम्मां मंदिर, खुशहाली और विस्तार देखा जा सकता है। 
बारिश का लुत्फ, दक्षिणी शैली में केले के पत्ते पर भोजन, सुगंधित फूलों के गजरें, स्थानीय लोगों से बातचीत का आनंद बखूब लिया गया।
भीतर तक ऊर्जा का उभार और महकती यादों के आगोश में क़ैद से आज़ाद नहीं होना चाहते … और जिंदगी भर सम्हाल के रखना चाहेंगे …  क्यों मित्रों!!

- निवेदिता दिनकर 



शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

चन्द्रमा



देखों, क्या …
गज़ब का आकर्षण,
रौशनी की अमृत वर्षा …
समुद्री उफान बन
ज्वार,
भाटा बन सिमटना  …
प्रेममय चाँदनी रातें,
अँधेरी वियोगी बातें  …
कोजागरी पूर्णिमा,
पौष पूर्णिमा,
तीज़ त्यौहार,
करवाचौथ मनुहार  ...
कवि की कल्पनाऐं,
हसरतें कसमसाय  …

छल, कपट 
साजिशें, लीलाएं  
मोह, माया,
किस्से कहानियाँ  


उफ्फ …
चन्द्रमा का खेल कितना तिलस्मी है।
है न ॥
- निवेदिता दिनकर 
   २९/०८/२०१४ 

शनिवार, 16 अगस्त 2014

धड़कन



रातों का झुरमुठ, 
गहरी भूरी धुंध,
चलती चली
मेरी 
'धड़कन' … 
घाव हरे, 
छोड़ दायरे  … 
तार कंटीले,
पाॅव मटमैले  … 
जिद्दी प्यास 
खोकर होशोहवाश …  

जस तस  
खींची एक 
ठंडी सांस 
और  
पहुंची 
इस बार 

देखने
करारे 
नए सपने  … 
करारे 
नए सपने  …  

- निवेदिता दिनकर  

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

बस एक बार


निश्छलता, उल्लास, उमंग, 
बेफिक्री, बेपरवाह, हुड़दंग … 
यही तो है 'हम' 
और 
हमारे अल्हड़ रंग ढंग। 

परिंदे, तितली, हवा,  
बादल, बिजली, घटा … 
यही तो है 'हम' 
और
हमारे पलते ख्वाब संग।  

फूलपत्तियां, तरु, 
पलाश, गुड़हल, टेसू ... 
यही तो है 'हम' 
और
हमारे न्यारे मस्त मलंग।  

कागज़, कलम, कल्पना, 
उत्साह, उड़ान, बचपना  …    
यही तो है 'हम' 
और
हमारे जोशीले ढोल मृदंग।  
   
समय को 'बस एक बार' पीछे लौटाने का मन जो हुआ है, काश !! 

- निवेदिता दिनकर
२४/०७/२०१४   

नोट : यह नटखट बच्चे काजल, रूपा, आरती, राजु, अंजली  जिनके माता पिता या तो कहीं दरवान है या मज़दूर या ड्राइवर है एवं हर शाम हमारी सासु माँ से निःशुल्क पढ़ने आते है, तो सोचा इनकी तस्वीर लूँ , फिर सोचा, कुछ नादानों के लिए लिख भी डालूँ …           

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

वृष्टि


तुम्हें याद करते हुए … 

वृष्टि के बूँदों की ढलक,
चमकीली रेशम सी झलक।  
फूल  पत्तियाँ बनी बतख, 
भीगी भीगी मैं अब तलक ॥  

- निवेदिता दिनकर 

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

तुम्हारी बातों में

 तुम्हारी मीठी मीठी बातों में 
इतना रस घुला हुआ,
मानों, बन जाती मैं मिट्टी 
सौंधी तरावट सी  …  
           
           
तुम्हारी बहकी बहकी बातों में 
इतना जादू भरा हुआ,
और बन जाती मैं छटपटी 
लीन विक्षिप्ता सी …      

           
तुम्हारी बाँकी तिरछी बातों में 
इतना तंज भरा हुआ 
फिर बन जाती मैं परिधि 
आकाशगंगा आकृति सी  … 

- निवेदिता दिनकर    

शनिवार, 5 जुलाई 2014

हे कांत!

हे कांत,

आज,
आज जब तुम 
चले गए,
चले गए बहुत दूर 
ज्ञान की खोज में चूर, 
त्याज्य मुझ और तनुज  .... 
एकदम अकेला,
निसहाय, 
बेबस  …  
सचमुच,
कितने निष्ठुर …  

क्या एक बार भी 
तुम्हारे 
पैर नहीं डगमगाए,    
साथ सोता छोड़ कर 
ह्रदय नहीं अकुलाए, 
माथे पर 
लकीरें नहीं गहराए, 
आँसू नहीं छलछलाए  …  

कि 
कैसे वेदना सहेगी? 
क्यों वेदना सहेगी ?

सिर्फ इसलिए न,
ज्ञान की खोज 
ही  
अंतिम  खोज है। 

हाँ, मुझे दरकार 
है तुम्हारी,
तुम्हारे नीरधि रूपेण प्रणय की        
तुम्हारे खुशबू रूपेण तारुण्य की,
तुम्हारे  प्रकाश रूपेण छुअन की,
तुम्हारे करुणा रूपेण असुवन की,
तुम्हारे  पाश रूपेण आसरा  की,
तुम्हारे बोध रूपेण आत्मा  की … 

क्योंकि 
मैं तुम्हारी 
यशोधरा 
केवल 
तुम्हारी …

- निवेदिता दिनकर  
  ०५/०७/२०१४  

शनिवार, 28 जून 2014

इंकार


समय सरपट दौड़ रहा
और 
मैंने मुकाबला करने से कर दिया इंकार। 
दावा कर दिया,
मनमौजियों से मत उलझना॥  
- निवेदिता दिनकर

रविवार, 22 जून 2014

आज

सहेज कर 
एहसास में लिपटा
वह सूखा सा फूल, 
फटे से कागज़ पर
लिख जाना 
मेरा नाम,
न कहने पर 
तुम्हारे होठों का 
बेबस हो सूखना, 
आज सब 
सोचने का मन कर रहा है …  
प्रेम की तपिश क्या केवल दो बाँहो के दरमियान ही पनपती है? 

- निवेदिता दिनकर 
  २२/०६/२०१४ 

शनिवार, 21 जून 2014

कब तक!


बिन पानी के भी बहे चले जा रहे 
और 
निकलते जा रहे 
मीलों दूर …
'अपनों' से !!    
आखिर कब तक !!!

- निवेदिता दिनकर 

नोट: साभार अमृता शेरगिल की खूबसूरत पेंटिंग 

मंगलवार, 17 जून 2014

चुप्पी



मेरी तसल्ली के लिए ही सही
मगर
तुम चुप्पी तोड़ डालो।

कितनी कही अनकही बातें
और
कितने छूते अछूते पल।

मालूम ही नहीं चला,
जब तुम पास थे
और

यह जानते हुए
भी
कि
जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग
केवल अंकगणित के अन्तर्गत ही नहीं
बल्कि
रहस्यमयी प्रक्रियाएँ है।

फिर भी,
यूँ ही गंवाते चले गए …


- निवेदिता दिनकर

नोट : उपरोक्त पेंटिंग रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा बनाई गई है | 

सोमवार, 16 जून 2014

ज्यों ही


कुछ लिखने की तमन्ना लिए ज्यों ही बैठती, 
कोई न कोई जरूरी गैर जरूरी वजहों से आखिर लिख ही नहीं पाई …
कभी बाहर, आंधी के से आसार दिखे, 
तो,
कमरे सन्नाटों से भरे हुए …

- निवेदिता दिनकर

शनिवार, 14 जून 2014

लहर


उफ्फ...
यह लहर, 
फिर लहर, 
और 
फिर एक लहर... 
हर पहर

लहर लहर...
आत्म मुग्ध
यह लहर...
क्षण भंगुर
है लहर,
फिर भी
लहर लहर... 


- निवेदिता दिनकर

शुक्रवार, 13 जून 2014

आँधी


आँधी के साथ एक जूनून, नहीं शायद एक मिटटी का एहसास, कह रही हो 
सब एक दिन धूल हो जाना है । 
मैंने कहा, ऐसे कैसे ?
अभी अंदर की "आँधी" का आना बाक़ी है, दोस्त॥


- निवेदिता दिनकर