रविवार, 12 अक्तूबर 2014

व्रत


आज तुम पास नहीं थे। लेकिन टेक्नोलॉजी की वजह से एक दूसरे से मुलाक़ात और बातचीत हो गई और इस प्रकार कब पच्चीस वे सालगिरह के नजदीक पहुँच गए …   
यों तो कभी तुमने करवाचौथ का व्रत रखने के लिए भी जोर नहीं दिया मगर अपनी तसल्ली और अपने को आँकने के लिए कोशिश जरूर करती हूँ॥       

बिन व्रत  
तुम्हें पाया।  
अब 
व्रत कर
अपने को 
पाने की 
कोशिश में … 

कितनी सगी, 
कितनी जटिल …  
कितनी उचित, 
कितनी खुदगर्ज़ …   
कितनी अभिमानी,
कितनी स्वार्थी …  
कितनी अपनी,
कितनी अपनों की …   

लगा कर 
कितने जोड़, 
कटौती …    
गणित,
विज्ञानं, 
अर्थशास्त्र … 
बन भी पाई 
कोई
आधी अधूरी अस्तित्व ?
थाह लेना जरूरी है॥ 

-  निवेदिता दिनकर 
    ११/१०/२०१४ 

फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (13-10-2014) को "स्वप्निल गणित" (चर्चा मंच:1765) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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