बुधवार, 20 सितंबर 2017

प्रेम


পাগলা হাওয়া 
মাটির ছোঁয়া ... 
রজনীগন্ধার স্নিগ্ধ  সুগন্ধ 
চাঁদের বোনা ... 
আঁচলে নদী 
মুঠিতে আকাশ  ... 

শুনছো,

 হৃদয়ে একটি প্রেম কাহিনী ভাসছে  ... 

-  নিবেদিতা দিনকর  
    18 /09 /2017 

उन्मादी हवा 
मिटटी में लिपटी  ... 
रजनीगन्ध की भीनी सुगंध 
चाँद का बुना ... 
आँचल में नदी 
मुठ्ठी में आसमान 

सुन रहे हो,
 मर्म में एक प्रेम कहानी तैर रही है  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  १८/०९/२०१७ 

प्रिय मित्रों, 
अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखने की कोशिश किया है और साथ में हिंदी में अनुवाद भी | आशा है, आप अपनी टिप्पणियों से मुझे उत्साह और न्याय देते रहेंगे | 

आपकी मित्र 

बुधवार, 13 सितंबर 2017

तेरे इश्क़ में ...


प्रिये, 
तुम इतनी क़यामत ढ़ाओगी,
इस क़दर कहर बरपाओगी ... 
कि  
तुम पर नज़्म लिखे बिना रहा नहीं जा सका | 

अब 
इस अदा बलखाना ,
कोमल नाज़ुक़ बदन की स्वामिनी होना ,
छरहरी,  
स्पर्श मात्र से 
बिजली कौंध जाना ... 
सब उस ख़ुदा की नेमत ही तो है |   

हाये ,
रफ़्ता रफ़्ता  ...  
आबोहवा भी 
तुम से  
और 
कुदरत का करिश्मा 
भी  ... 

जिस सांचे ने 
बेमिसाल तराशा ,
जिस ग़ज़ल ने 
जान फूँका , 
कोई भी 'मक़बूल' फ़िदा होने से अपने को नहीं रोक सका | 

ऐ मीठे स्वाद धारिणी ,
ऐ पतली कमरिया नु , 
ऐ बेलनाकार 
'लौकी'

पहले 
तुम,
फिर 
तु ,
फिर  
तेरे इश्क़ में  ... 
 
' ग़ुलाम ' 
बन गए  ...  

- निवेदिता दिनकर 
  १३/०९/२०१७ 

तस्वीर : मेरे बागीचे की शान 

सोमवार, 11 सितंबर 2017

मंजर


रेज़ा रेज़ा हुए जा रहे है | 
देखो कैसे जिये जा रहे है | 
अजीब मंजर है मिरे मुल्क का  
रेत को भी रेते जा रहे है ||  

- निवेदिता दिनकर 
  11/09/2017

तस्वीर :  " सुबह "
यह बच्चे एक प्रतियोगिता के तहत 

रविवार, 10 सितंबर 2017

हैल सितम्बर ...




सितम्बर शुरू हो गया है | 
कुछ सालों से सितम्बर पर ज्यादा ही ध्यान जाने लगा है | 
वैसे मेरी ज़िन्दगी के पहले नौ महीने (गर्भ ) से लेकर अब तक के सारे ग्रीष्म वर्षा शीत मंगल प्रदान करने वाली, मेरी शख्सियत सँवारनेवाली, महानों में महान आत्मा, मेरी "माँ " का जनम दिवस पड़ता है | २६ सितम्बर ... 

वैसे ' माँओं ' को कहाँ कब शब्द लकीरें थ्योरम चाँद तारें नाप पायें है ? विशेषण विशेषज्ञ तो बेचारे बस यूँ ही ख्याली बेख्याली हलवा पूरी पुलाव पकाते रहते है |  

मगर सितम्बर को और खूबसूरत, और पाक, और नमकीन बनाया एक और 'माँ ' ने, वह है "मेरी सासु माँ" | उनके जैसा कोई नहीं | जी, यह सच है | सारी कायनात एक ओर और मेरी सासु माँ एक ओर | जो कुछ दुनियादारी , नौकरी, आटे दाल का भाव , सीखा/ गुना, सब उन्हीं से | मेरी सहेली भी मेरी गार्डियन भी |        
उनका भी आगमन इसी सितम्बर में , २४ सितम्बर ... जनाब | 

वैसे तो इतना ही काफी था , हे सितम्बर | 

पर एक सितम हुआ, जब  २९ सितम्बर, २०११ में जब बेबात,  "बापी" ने इस विचित्र दुनिया से रुखसत लिया, तब सारी ज़िन्दगी का सार एक ही झटके में समझ में आ गया | 
एकदम दर्ज़ा बेटी से माँ का हो गया | यानि अब 'माँ ' बेटी बन गयी और माँ की "माँ " हम | 
जो बेटी "आदोरेर टॉकी"( टॉकी मेरा डाकनाम है ) "मामोनी " हुआ करती थी , आज/अब है माँ | 

मेरे बापी को बर्फी बहुत पसंद थी /है | तो उनके लिए बर्फी उनके नाम से अमूमन मंगवाती रहती  
हूँ | मगर चूँकि  बापी ने अपने जीवन के सारे कार्यकलाप रेलवेस को समर्पित किए और रेलवे ने उनको रखा बरेली
नामक जंक्शन में, सो, "बरेली के बर्फी " के मुरीद | पिक्चर नहीं , मिठाई | 
जी, सही पढ़ा, बरेली की बर्फी, एकदम खरी, बेबाक, स्वाद से भरी | 
काफ़ी कुछ मेरी तरह  ... 

कितने भी तू कर ले सितम 
हँस हँस के सहेंगे हम 
ये प्यार ना होगा कम 
सनम तेरी कसम ... 

पिक्चर अभी बाकी है , मेरे दोस्त ... 

- निवेदिता दिनकर 
   १० /०९ /२०१७ 
 
 तस्वीर : शादी के पचासवें सालगिरह में  बापी के साथ की आखिरी तस्वीर, २०११   

बुधवार, 30 अगस्त 2017

अचेतन






"काली मछली पीछा ही नहीं छोड़ रही थी | 
तभी मुझे किसी ने वहाँ से हटा कर मेरे पुराने मित्रों के पास छोड़ दिया | 
मुझे वापिस आकर बहुत अच्छा लगा | 
मैं ख़ुशी के मारे रोने लगी | 
लेकिन यह क्या? मेरे आँखो में पानी तो था, मगर मेरे किसी दोस्त को पता ही नहीं चल पाया  कि मैं  रोई भी हूँ क्योंकि क्योंकि मेरे चारों ओर पानी ही पानी था |" 

नारंगी मछली सोचते सोचते सुबकने लगी | 
काश ...

- निवेदिता दिनकर 
  30/08/2017

तस्वीर : आँखों सुनी कानों देखी 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

शायद ही




चारों तरफ लहू 
और सब 
एक दुसरे का लहू पी रहे 
'वैम्पायर'  ...  

सब सिर एक तरफ 
देह से अलग 

मान लिया है देह ने भी 
कि वह इस में खुश है | 
जरा सी भी आपत्ति नहीं| 

राक्षसी प्रवृत्ति 
की 
प्रथा आज 'डिमांड' में जो है|  

शर्म से सूरज भी उग नहीं पाता 
निढाल हो जाता है | 
और चाँद तारें  ... 
मुँह छिपाये रात का सहारा लिए 

कहते है ,
फिर समुद्र मंथन होगा 
और क्षीर सागर को मथ कर 
अमृत पान 
लेकिन,

 लेकिन
 विष निगलने

कोई नीलकंठ ... 
अबकी बार 
शायद ही आये  ...  
- निवेदिता दिनकर 
  25/08/2017

फोटो क्रेडिट्स : मेरी नज़र "मंथन के लिए तैयार समुद्र ", लोकेशन : मंदारमनी , पश्चिम बंगाल   

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मृगमरिचिका


रंगों ने 
रंगों को 
रंगों से 
रंगों के 
रंगों द्वारा 
रंगों के लिए 
रंगों का 
रंगों के 
रंगों की 
रंगों में 
रंगों पर 

रंग दिया  ... 

हे रंग! 
अरे रंग !!

- निवेदिता दिनकर
  22/08/2017

फ़ोटो क्रेडिट्स : मेरी नज़र , लोकेशन : डी एल एफ मॉल , दिल्ली 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

असाधारण लम्हें








यूँ तो यह मामूली सी ही बात है, लेकिन खासम खास मेरे लिए , मेरे अंदर की जान के लिए  ... 

पिछले दिनों लखनऊ जाना हुआ, राष्ट्रीय पुस्तक मेले में कविता पाठ हेतु  जो मेरे लिए तो हज़ार भाग्य की बात है, पर बोनस के तौर पर एक खुशखबरी और मिली कि बेटे की मीटिंग लखनऊ में १४ तारीख को होने से १३ को वह भी पहुँच रहा है | जानकर, बच्चों सी खुश हो गयी क्योंकि पिछले दो तीन महीने से नौकरी की वजह से वह घर भी नहीं आ पाया था | बस फिर क्या था , मैंने कहा , जिस होटल में तुम रुकोगे मैं भी वहीं रुकूँगी, इस बहाने एक दिन एक रात तुम्हारे साथ रह लूँगी | 

मैं दोपहर दो बजे लखनऊ पहुँची, चेंज किया और हम साढ़े तीन बजे तक वेन्यू पहुंच गए | कार में बेटे जी बोलते है , 'मम्मा , प्रैक्टिस कर लो, एक बार '| मुझे उसकी यह बात इतनी अच्छी लगी , फ़ौरन गाड़ी में ही शुरू हो गयी | उसने ख़त्म पर 'थम्ब्स अप' दिखाया, तो मैं बस ...  
 खैर, बेटा भी अपने नरसी मोंजी कॉलेज, हैदराबाद में मैगज़ीन कमिटी का एडिटर रह चुका है और एक ज़बरदस्त लाइब्रेरी का मालिक, जो उसके आगरा घर में सुशोभित है | बचपन की चम्पक, नंदन, टिंकल, अमर चित्र कथा से लेकर जैकी कॉलिंस, मारिओ प्यूज़ो , अल्फ्रेड हिट्चकॉक , Ayn Rand, एरिच सेगल, अमिश त्रिपाठी और भी कितनें सारे नाम | 

रात मुझे लखनऊ की स्पेशलिटी कबाब्स का जायका दिलवाने "रेनेसांस" भी ले गए और मैं बस आनंदित होकर बहती जा रही थी , लहरों से अठखेलियाँ कर ... 

 एक साधारण सी माँ के लिए इतने असाधारण लम्हें |     

और क्या चाहिए ...   

काँटों से खींच के ये आँचल
तोड़ के बंधन बांधे पायल
कोई न रोको दिल की उड़ान को
दिल वो चला..
आज फिर जीने की तमन्ना है
आज फिर मरने का इरादा है ,,,  


- निवेदिता दिनकर 
  18/08/2017

फ़ोटो : लखनऊ 

बुधवार, 9 अगस्त 2017

सुन विकास बराला,

सुन विकास बराला,

आज सब तेरे करतूत को थू थू कर रहे है| तु इतना तो अपडेट होगा ही | 
ब्रेकिंग न्यूज़ में जो तेरी फिल्म बन रही है, उस से तो तु वाकिफ़ है |  
और तेरी प्यारी माँ ... 

वह बेचारी अपने को कितना कोस रही है , शायद अपने को छुपाये छुपाये फिर रही हो | 
तुझे पैदा करने से पहले से लेकर अब तक की सारी बातें सोचती जा रही होगी | 
यह भी दिमाग़ में आ रहा होगा, कि, क्या ग़लती हो गयी उस से, कब तु इतना बीमार हो गया ? 
इतना ओछा हो गया, इतने  गर्त में गिर गया, कि लड़की देखी और विकृति आ गई| 
तेरी माँ, घर के और बहु बेटियों के बारे में भी सोचकर दुःखी हो रही होगी कि कहीं ऐसी हवस ने कहीं और भी ... इस ख्याल मात्र से उसकी रूह काँप गयी होगी | 

क्यों, आख़िर क्यों किया ?  उक्त घटना से एक शाम पहले, या सुबह, या एक घंटा पहले सब कुछ कितना ठीक था ... यह क्या कर डाला ?
सब कुछ, वह बेचारी माँ सोच रही है जिसका तुझे रत्ती भर भी इल्म नहीं, विकास | 

अब क्या करेगा ? क्या सोच रहा था, कि तु किसी ऐसे आदमी का बेटा है, और तु कुछ भी कर सकता है, कोई पाप कृत्य करेगा और बच जाएगा, 
तो 
सुन विकास     

अब अपने ही घर में घुट घुट कर मरणासन्न जीने के अलावा तेरे पास और कोई चारा नहीं क्योंकि 
बाहर हमारी पाठशाला तेरे इंतज़ार में है | 
अच्छा हाँ, हम दिन में, रात में, शाम में, दोपहर में, जब मर्ज़ी हो, जहाँ मर्ज़ी हो, आएंगे जायेंगे, और जो मर्ज़ी हो पहनेंगे |  

|| याद रखना, अगली बार तेरे घर में घुस कर मारेंगे ||    

- एक और वर्णिका    
  ०९ /० ८ /२०१७

नोट : यह एक खुली चिठ्ठी है और हर उस सिस्टम के लिए है जो बददिमाग, बेअदब , बेईमान है और उस पर नकेल कसने की सख्त जरूरत है | 
तस्वीर : मेरे द्वारा ,  ताजमहल के पास , आगरा  

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

तेरे बिना





आज 'सिन्दूरी शाम' मासूमियत के रंगो में लिपटी ऐसे ज़मीन पर उतरी कि 
उसकी चमक उसकी रौशनी उसकी बंदगी, बेहाल कर गई |  

हुआ यूँ कि  सड़क पर विचरण करने वाले मेरे चार दोस्त , प्यारे श्वान, में से दो, अपने भोजन के लिए मेरे घर के सामने एकत्र हुए तो देखा देखी एक गाय माते भी आ पहुँची और फिर जम कर "पहले मैं " "पहले  मैं " का नारा लगाते हुए मिलजुल कर रोटी खाने लगें, पानी पीने लगें | 

डार्विन जी की थ्योरी सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट, स्ट्रगल फॉर एक्सिस्टेंस भी कामयाब दिख रही थी| 
नज़ारा बेहद दुर्लभ था, बिना उनसे सहमति लिए, खूबसूरत तस्वीर लूट लिए | 

दिल की ख़ुशी देख दिमाग सवालों में उलझ गोता लगाने लगा कि हम मिलजुल कर रोटी कब खाएँगे ?  

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई
शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं, शिकवा नहीं
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन
ज़िन्दगी तो नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं
     
 - निवेदिता दिनकर 
  २७/०७/२०१७ 



 
 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

मुठ्ठी भर ...





कुछ बातों / खबरों से मैंने अपने अंदर अवसाद को उतरते महसूस किया है | वह खबर, हादसा , घटना कभी कभी मेरे अंदर इतना लाचारी भर देती है, कि मुझे अपने आप से ही कष्ट होने लगता है | जरूरी नहीं, वह घटना मेरे साथ या  मेरे अपनों के साथ घटी हो पर बस बेबस कर जाती है | 

ऐसे में गीतों या फिल्मों या अपनी पालतू डॉगी या कुछ और डॉगी जो सड़क पर घुमते है और लगभग पालतू नुमा से हो गए है से बड़ा सहारा मिलता है | 
कभी तो  हवा में ही कुछ भाव कच्चा पक्का उकेर देती हूँ और सुकून पा लेती हूँ | अब हर वक़्त कागज़ कलम तक पहुँचना कहाँ हो पाता है | 

माँ बताती है , बचपन में राह चलते कुत्ते के बच्चे , बकरी के बच्चें, चिड़ियों  के बच्चे घर में उठा लाती थी और माँ से ज़िद करती थी कि इनको पाल लो | 
आसपास के घरों में अब कहीं  मेरी बचपन वाली रज़िया आंटी नहीं दिखती , न ही पाठक आंटी , न ही गोयल आंटी न ही कुलवंत आंटी बल्कि आस पास जाति और मज़हब और सोच दिखती है  या दिखती है फॉरेन रिटर्न्ड या मर्सिडीज़/ बी एम् डब्लू वाली कोठी या ए सी/ विदेशी / स्वदेशी के मद से प्रदूषित होता वातावरण | 

ओह ,  कब तक ...     चलो एक बार फिर से ...           ~ ~ ~
 गुफा, नदी , झील , प्रकृति और प्रकृति  ...  
पाषाण युग कैसा रहेगा ??

बस, मुठ्ठी भर  ...  

- निवेदिता दिनकर 
  २५/०७/२०१७
फोटो : एक मुठ्ठी शाम, लोकेशन आगरा , ताज महल के पास 

शनिवार, 17 जून 2017

कवितायें








एक से बढ़कर एक 
कवितायें 
नायाब, बेमिसाल, असाधारण  ...   

प्रेम से भरी हुई 
ज़िन्दगी से लबरेज़ 
शहद में डूबी 
शहनाई को मात करती नवेली धुन जिसकी   
चिड़ियों की मासूम कलरव करती 
ग़ज़ल नुमा 
निष्कलंक
संपन्न

किसको पढ़े 
किसकी आरती उतारें 
प्रशांत महासागर से भी गहरें 
रुई मलमल से थोड़ी ज्यादा मुलायम 
आह जैसी चाह  ...  

वातानुकूलित कमरों से निकली 
कवितायें 
शायद ऐसी ही होती है !!

- निवेदिता  दिनकर
  १७/०६/२०१७ 


तस्वीर : तपती धूप तकती पेट 

शनिवार, 10 जून 2017

मेरी नायिका - 8




एक मेहनतकश खुद्दार माँ की सफलता यूँ हासिल हुई जब उसकी मेहनती बुद्धिमान मेधावी बेटी यू पी बोर्ड 2017 की बारहवीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स लेकर ७५ % अंक से उत्तीर्ण हुई |
ख़ास बात यह कि इस बेटी की माँ कोई स्कूल कॉलेज कभी नहीं जा सकी और मेरे घर के काम काज में पिछले कई सालों से हाथ बटांती है | पिता इ रिक्शा चलाते है | यू पी बोर्ड की दसवीं में ८५ % पहले ही ला चुकी है |
इस हुनर और जूनून को हमारा सलाम मिलना ही चाहिए |
मेरी और दिनकर की अपेक्षा है कि मैं इस रानी बेटी " रेणु कौर " को आगे चलकर सिविल सर्विसेज में जरूर बिठाऊँ | आगे जो रब राखा ...

 - निवेदिता दिनकर 
   १०/०६/२०१७ 

बुधवार, 24 मई 2017

प्रिय अभिभावकों,




प्रिय अभिभावकों,

इन दिनों हर चैनल, वेब साइट्स , घर, अड़ोस पड़ोस पर बारहवीं के रिजल्ट निकलने का ही इंतज़ार है|
मेरे घर में भी बेसब्री है | मेरी बेटी उत्कंठित है, थोड़ी व्याकुल थोड़ी उत्सुक | यह जाहिर सी बात है |
पर दोस्तों , कुछ चीज़ों का ख़ास ख्याल रखना होगा एक माँ, एक पिता के हैसियत से |
१. घर पर अच्छा ख़ुशनुमा माहौल रखें |
 २. खूब हँसे, बोले, चहके |
३. खाने पीने में बच्चे के स्वाद का ध्यान रखा जाए और खाने के टेबल पर साथ बैठकर खाये |
४. दोस्तों से बात करने को बोले और उनसे मिलने जरूर दिया जाये |
५. बात बात पर टोका टाकी तो कतई न करें |
६. घर में छोटे छोटे कामों में हिस्सेदारी दे और रसोई में भी मदद ले, मसलन सलाद कटवाना, डाइनिंग टेबल पर प्लेट्स , कटोरी रखवाना , आदि |
७. सुबह जल्दी न उठने के लिए डाँटे नहीं, प्यार से उठाईये |
८. ऑनलाइन छोटी मोटी शॉपिंग भी करने दे |
९. अगर घर पर पेट्स है तो उसे घूमाने ले जाये , उसके साथ खेलें |
१०. सबसे जरूरी , समझाते रहें कि रिजल्ट ही है , कोई हौआ नहीं | पूरी जिंदगी बाकी है |
११. एक परसेंट रिजल्ट अच्छा न भी आये तो क्या हुआ | बस स्ट्रांग रहो , बोल्ड रहो, हम है तुम्हारे साथ| आपका इतना कहना ही उसके लिए नयी ऊर्जा का संचार करेगा |
चलिए , मुझे भी अपनी बेटी के साथ शॉपिंग पर जाना है , यूँ ही थोड़ी मस्ती करेंगे हम माँ और बेटी
खुशियों के पलों को बस यूँ ही संजोते रहिये ...
देखिएगा, कितना सुकून है ...
- निवेदिता दिनकर
  २४/०५/२०१७

सोमवार, 22 मई 2017

हलाला ?




मेरे घर में वाल पेंटिंग करने वाले बबलू ने अचानक दोपहर ३ बजे बताया कि उसे अब घर जाना है, क्योंकि उसकी बहन का आज निकाह है | मैं चौंकी क्योंकि उसने मुझे सुबह से  जिक्र तक नहीं किया था |  मैंने कहा , अरे, जरूर जाओ लेकिन पहले क्यों नहीं बताया ? तुमसे क्या काफी छोटी है?  तो वह बोला  कि असल में उसका निकाह दोबारा हो रहा है |  
अच्छा ... 

हाँ, बबलू का नाम इसरार भी है| 

फिर उसने पूरी बात बतायी कि उसके बहन का  निकाह पहले वाले शौहर के साथ हो रहा है और दूसरा निकाह जिस आदमी के साथ हुआ था वह निकम्मा और आलसी निकला | 

जब पूछा, पहले वाले से तलाक़ क्यों हुआ था ? तब बताया पहला वाला शराबी था , बहुत परेशान करता था | तब फिर से पहले वाले से क्यों?  क्योंकि अब वह पहले से सुधर गया है और हमारे पापा भी नहीं रहे | तो एक आदमी तो घर में चाहिए| और बच्चें ? हाँ, पहले से एक बेटी दुसरे से दो बेटियाँ |   

यानि यह तीसरा निकाह था ...

अच्छा, "हलाला " शब्द से वह अनभिज्ञ था लेकिन यह कुप्रथा उसके समाज में प्रथा के रूप में जड़ो में व्याप्त दिखीं | और उस से बात कर के लगा जैसे ... जाने दीजिये अब |     

मुझे ऐसे लॉजिक समझ में तुरंत आ गए और शायद आपको भी  ...   

- निवेदिता दिनकर 
  २२/०५/२०१७ 
  
तस्वीर : इस छोटी सी बच्ची से मुलाक़ात ताजमहल परिसर में हुई थी | 

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

लौट आओ



इंसानी बस्ती के साथ आपके और हमारे घरो में फुदकने वाला  "प्रेम " आखिर कहा चला गया ? ये सवाल पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी के लिए भी आज चिंता का सबब बनता जा रहा है। 
घरों को अपनी कुचु पु चु से चहकाने वाला प्रेम  हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। मनुष्य जहाँ भी मकान बनाता है, वहां प्रेम अपने आप जाकर घोसला बना कर रहना शुरू कर देता हैं।
इस ढाई अक्षर वाले खूबसूरत शब्द  का कभी इंसान के घरों में बसेरा हुआ करता था और बच्चे बचपन से इसे देखते हुए बड़े हुआ करते थे। अब स्थिति बदल गई है। जिसके परिणाम स्वरूप प्रेम  तेजी से विलुप्त हो रहा है। इस के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफी कम कर दी है और कहीं..कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देता और इनकी जगह धूर्त पंतियो ने ले लिया है |  
 
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस की आबादी में 60 से 80 फीसदी तक की कमी आई है। यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि "प्रेम " इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले।  
पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार प्रेम की आबादी घटकर खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।   लोगों में प्रेम को लेकर जागरूकता पैदा किए जाने की आज सख्त जरूरत है |   

संपादकीय विचार: कुछ दिनों से प्रेम की चहचाहट बमुश्किल सुनाई देती है। विलुप्त होता प्रेम की प्रजाति को लेकर लोगों में बचाव अभियान की मुहिम चलाई जा रही है।
काश इस मुहिम के तहत लोगों में बदलाव देखा जा सकता !!

- निवेदिता दिनकर 

तस्वीर : उर्वशी दिनकर की नायाब पेंटिंग 
  

चाँदनी




रातों की चाँदनी हो या हो चाँदनी रात |
ढूँढ ले ही लेते है हम खुश्बुओं की सौगात || 
 
- निवेदिता दिनकर 

तस्वीर : उर्वशी दिनकर 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

इंतेज़ार


सहमे से रहते है, जब यह दिन ढलता है ...
क्यों यार, क्यों आखिर 
अब नहीं, पक्का अब नहीं ...
नो, नॉट अगेन ...
कल कहा था न, अश्क़, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते और सरे आम बहने लगते है।
अश्क़ मेरे से नहीं छिपते, मुश्क़ तुम लगाये फिरते हो
और हमारा इश्क़ ...
वह तो जगजाहिर है ...
है न ...
पता है, तुम्हें ? जब तुम्हारी कल वापिसी होगी
मैं फिर से ' मैं ' बन जाऊँगी और तुम्हें देव से फिर ' तुम ' बना दूँगी ...
दिल की बात न पूछो
दिल तो आता रहेगा
दिल बहकाता रहा है, दिल बहकाता रहेगा ...
- निवेदिता दिनकर
  06/04/2017
तस्वीर : उर्वशी दिनकर के सौजन्य से 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

सुकून



उन दिनों मैं देहरादून में बेटे के पास थी जब मुझे एक फोटो के माध्यम से बताया गया कि एक दो महीने का मेहमान घर पर आया हुआ है । मुझे यह ख़बर बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी।
मैं कोई भी प्रकार, स्पीशीज का " इंसान द्वारा प्रदत्त नाम 'कुत्ता' " नहीं रखना चाहती थी क्योंकि ...
खैर ...
असल में मेरे अंदर इमोशन्स को काबू में रखने की अक्ल का अकाल है।
अश्क़, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते और सरे आम बहने लगते है। पिछले कुछ सालों में तीन प्राणियों को खो चुकी हूँ और अब साहस नहीं है॥
लेकिन अब यह साहिबा आ चुकी है, और दो बरस की है। जैसे इनको ठंडी जमीं सुकून देती है वैसे ही इनका 'पास' होना मुझे सुकून देता है।

मेरे कानो में यह गीत बज रहा है,
मरके भी न मिटे जो, यह वो दीवानगी है ...
दिल को लगाकर देखो, प्यार में क्या ख़ुशी है ...

... और चाहिए भी क्या, बस !!


- निवेदिता दिनकर
०४/०४/२०१७

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

मेरी नायिका - ७



" एक मुठ्ठी चावल दे दो ... 
 एक मुठ्ठी चावल दे दो "
इस चालीस डिग्री तापमान की दोपहरी में लगभग ७० साल की एक बुजुर्ग स्त्री सड़क पर जोर जोर से बोलते/पूछते हुए। 
मैं छत से देखती हूँ तो पूछती हूँ कि भूखी हो ? क्या रोटी खा लोगी ?
उसने 'हाँ ' में सर हिलाया।
तुरंत नीचे जाकर दो रोटी सब्जी, मठरी, एक मीठे के साथ ले जाती हूँ और उसके हाथ में डिस्पोजेबल प्लेट पर परोसा खाना रख देती हूँ। फिर पूछती हूँ अम्मा, कहाँ से हो ?
बताती है, लखनऊ से।
क्या करती हो ? तो कहने लगी, ढोलक बनाती हूँ।
फिर सड़क किनारे बैठकर खाना खाने लगी।
मैं चलने लगती हूँ तो बोलती है कि कुछ पहनने के लिए साड़ी है? मैंने कहा, अच्छा रुको। कहकर एक सलवार कुर्ते का जोड़ा निकलती हूँ और दे आती हूँ। मैंने कहा, ख़ुद ही पहनना। सुनकर कहने लगी , क्या बात करती हो ? तुमसे मोहब्बत हो गयी है । भला किसी और को क्यों दू ।
उसकी बातों पर मुझे हँसी आ गयी मैंने पुछा, क्या मैं तुम्हारी फ़ोटो खींच सकती हूँ ? तुरंत दुपट्टे से अपने सर को ढाँकती है और कहती है, "हाँ " और मैं तुरंत दो फ़ोटो खींच लेती हूँ ।
अपनी फ़ोटो को देखने के लिए मेरा मोबाइल माँगती है और उसका खिला चेहरा देख
मैं अंदर तक गुनगुना जाती हूँ।
आनेवाला पल जानेवाला है
हो सके तो इस में जिन्दगी बिता दो
पल जो ये जानेवाला है ...


- निवेदिता दिनकर 

सोमवार, 27 मार्च 2017

प त झ ड़


अरे ऐ, 
पतझड़ की दुपहरिया
शाखों से पत्ते क्या गिरे
तूने तो मेरे धड़कन की जमीं रंग दिया
लगता है,
रक्त ने भी रंग बदल लिया होगा ...

- निवेदिता दिनकर
२७/०३/२०१७

तस्वीर : मेरे द्वारा क़ैद "प त झ ड़"

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

उदाहरण के परे ..




बापी हमारे तब  Izatnagar, इज़्ज़तनगर, बरेली में पोस्टेड थे। 
हमारे पड़ोस में पाठक आंटी सपरिवार रहती थी जिसमें अंकल और उनके पाँच बच्चे थे। जब भी वह हमारे घर आती थी, हमारे घर का पानी चुल्लू में लेकर पीया करती थी क्योंकि हम बंगाली लोग मछली खाते है और वह थी विशुद्ध शाकाहारी। मगर उनके बच्चे allowed थे हमारे घर का कुछ भी शाकाहारी खाने के लिए । 
अच्छा मज़ेदार बात यह थी, कि आंटी का यह बर्ताव कभी खला भी नहीं। 
शायद इसलिए क्योंकि वह बेहद मददगार थी। जब माँ का एक बार टेबल फैन के ब्लेड से उनकी तीन उँगलिया लगभग कट सी गयी थी और हम बहनें बहुत ही छोटी थी, तब उन्होंने ही माँ को नहलाने, खिलाने से लेकर हमारी देखभाल ऐसे की थी जैसे ... यानि किसी उदाहरण के परे  ... 

हमारे घर के सामने के दाएं तरफ एक मैसी परिवार रहता था । अंकल की जगह यहाँ भी आंटी ज्यादा मशहूर थी जो टीचर जी के नाम से ज्यादा जानी जाती थी। हम सबको  २५ दिसम्बर का बड़ा इंतज़ार रहता था शायद क्रीम से भरा केक खाने को जो मिलता था ।  और २४ दिसम्बर से ही यीशु के कैरोल्स शुरू हो जाते थे।

बराबर से ही फैज़ परिवार था जहाँ हैंडसम सलीम अंकल और उनकी खूबसूरत पत्नी रज़िया रहती थी। आंटी के हाथ की सेवइयाँ ... आहह !! स्वाद तो अभी तक जुबान  पर चढ़ा हुआ है । कबाब तो आज तक उनके घर से बेहतर कभी चखा ही नहीं।

अरे, कहाँ है आप लोग ?

- निवेदिता दिनकर