सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यह कैसे हो सकता है?



अच्छा,
जब वह तडफ़ रही होगी ,
तङफ़कर कर चीख़ रही होगी,
हिचकियाँ ले लेकर ...
फिर थक कर
थक कर सुबक रही होगी ,
तब
तब भी तुम्हें ...
तब भी किसी एक को भी ...
... ...
कोई दर्द
कोई अफ़सोस
कोई ग्लानि
नहीं ...
कैसे हो सकता है ?
यह कैसे हो सकता है?
फिर, तुम कौन जाति ?
फिर , तुम लोग आखिर कौन ?
मैं ,
जानना चाहती हूँ ...
पहचानना चाहती हूँ ,
तुम लोग कहाँ से पैदा हुए ?

- निवेदिता दिनकर 
चित्र : देहरादून के रास्ते मेरे द्वारा खींची गयी 

रविवार, 18 मार्च 2018

मन का मौसम



आज मौसम का मन तो मसूरी मसूरी हो रहा है और मन का मौसम चुप। 
कहीं कोई दास्ताँ बरस पड़ा होगा, शायद। तभी खलबली मच रही है। 

अभी इंतेहानों और इंतज़ारी का मौसम है। यानि अप्रैल मई तक परीक्षाऐं खत्म होंगी और बीच में कोई तीज त्यौहार भी नहीं। तब तक हम जैसे ऐसे ही 'इंतज़ार' को सेलीब्रेट करते रहेंगे। बच्चें कभी पढाई तो कभी नौकरी से तारतम्यता के चलते घर फोन भी कहाँ कर पाते हैं। उनकी आवाज़ जिससे धडकती हमारी जिंदगी की हँसी, साँस, गुलज़ार छटपटा जाती है। परन्तु हम अपने दिल की बात कहाँ कह पाते है उनसे, है न ?

 सच है, कि व्यस्त हम सब है कहीं न कहीं। झकझोरती हूँ अवगत कराने के लिए 'अपने' को "अपने" से।

 इमोशंस को उठा कर डीप फ्रिज़ में रखना सीख लिया है मैंने।


 - निवेदिता दिनकर

तस्वीर : मेरे सौजन्य से : गेहूँ की बालियाँ , कछपुरा , आगरा 

बुधवार, 7 मार्च 2018

बच्चें






हर बार बच्चें जब अपनी कॉलेज या नौकरी से छुट्टी ले कर दो तीन दिन के लिए घर आते है , हर कोना घर का किचन के साथ साथ महकने लगता है  क्योंकि कहीं जीरे हींग का छौंक तो कहीं  किस्से कहानियों का छौंक तो कहीं हँसी ठट्टों का छौंक |   

मेरे घर में हमारी 'आपसी बहस' भी बेचारी तरस जाती है, वह भी बैक सीट पर चली जाती है | 

क्या खिला दूँ , कहाँ ले जाऊँ, थोड़ा सा और पास बैठ लूँ , मगर हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है | दोबारा पकड़ने के लिए यह छूटना भी तो चाहिए |  फिर वह फ़ोन पर निबटती है थोड़ा थोड़ा कर |   
अरे, पैसे रख लिए ? सब एक जगह मत रखो ? टिकट रख लिया ?  झुमकी बोलती है, "अरे , पापा , मोबाइल में टिकट है | तुम लोग बेबी की तरह ख्याल रखते हो | "

 उनके कमरे में जाकर 'जैसे वे छोड़कर जाते है ', वैसे ही चीज़ो को रखें रहन देती हूँ |  इस बार से लेकर अगली बार तक के लिए | उनकी छुअन , उनकी नोक झोंक , उनकी अधूरी बातें अगले कड़ी में घुलने तक सब तरो ताज़ा सी | 

एक पड़ाव में आकर फिर आप और आपका साथी, बिलकुल शादी के बाद टाइप लाइफ| वैसे यह मौका या दस्तूर सहेजा जाये ,  उचित अनुचित उपयोग लिया जाये , दुरुस्त एनर्जी का संचार रहता है | सोचा जाये तो , आपसी सहमतियाँ असहमतियाँ होती भी रहनी चाहिए | यह किस्से फिर कहीं |   

पता है , बच्चें अब बच्चे नहीं है पर वह बच्चे रहेंगे |  
बच्चें आत्मा से होते है, सचमुच  ... 

- निवेदिता दिनकर
  07/03/2018

फोटो क्रेडिट्स : दिनकर सक्सेना , "दूर ढलती साँझ "


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

एक सब्र ...




रात ने  किया मुझे बेहद आकर्षित ... 
सर्द रातें तो बिलकुल नवयौवना सी और बारिश प्रेमी 
एक दुसरे के साथ मिल, 
अपनी बेमिसाल खूबसूरती को देते है 
नया रूप  ...  
एक दिव्य रूप | 

मुझे यह जोड़ा बेहद पसंद है | 

एक बेखौफ प्रेमी , 
जो दुनिया के हर दस्तूर से मीलों आगे | 
एक बेपरवाह अंदाज़, 
जिसे मिलने से कोई नहीं रोक सकता |
 एक आग , 
एक छटपटाती रूह जो गर्म लावा  बनकर कर दें सबको भस्म  

सुनों ,
इनके ज़ोर से धड़कते सीने की आवाज़ , 
इनके हाथों के गर्म तालु ,
इनके रौद्र रूप ... 

दुनिया के सिरमौर प्रेमिक कतारों  ... 
हीर राँझा , सोहनी महिवाल , रोमियो जूलिएट , शीरी फरहाद, लैला मजनूं 
इन सबके भौतिकी से कहीं ऊपर |
   
हाँ , 
यह तिलिस्म है | 
इसे शिद्दत से महसूस करना पड़ता है | 
पूरे में भी अधूरे और अधूरे में भी पूरे | 
बंद आँखों से एकदम साफ़ झलकते है |
भौचक्का कर देती है ऐसी दास्तानें | 
एक पाकीज़गी  ...
एक सब्र  ...  

यह जो आशिक़ी है , न | 
मन की आशिक़ी , 
रोम रोम की आशिक़ी ,
दुआओं की आशिक़ी ,
शुकराना की आशिक़ी  ... 

यही इबादत है |
यही नमाज़ है |
यही रोज़ा है | 
यही मक़ाम है | 


- निवेदिता दिनकर   
  २५/०१/२०१८ 

फोटोग्राफी : एक कौतुहल , मसूरी 

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

तन्हा




शाम है 
सर्द शाम है 
एक तन्हा सर्द शाम है  

हौले हौले परदे के हिलने से महसूस हो रहा 
कोई है ...  

उठकर बाहिर देखा 

सर्द हवाएँ 
दस्तक दे रही है | 

शाम अब महफूज़ है  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  23/01/2018

फोटो : एक तन्हा शाम , लोकेशन देहरादून 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

आह! ऐतिहासिक जगाधरी...





एक ऐसी भी ख्वाहिश है कि हर रात एक नये शहर में गुजरे। 
हर शहर की एक अलग फ़िजा। 
फ़िजाऐं बता देती है फितरतें। 
देह लिए होती है और होती है उसमे एक उन्मादी गंध | 
महसूस किया है मैंने |

सड़कों पर,
दरख्तों पर, 
ईटों पत्थरों पर,
तिलस्मी कहानियों का ज़खीरा सोया हुआ है, एक आहट के इंतज़ार में। 


आज ' रात ' चाँद तारों के साथ अलाव जलाकर कुछ गपशप करने की फिराक में है। 

श श श ... 

- निवेदिता दिनकर
 18/01/2018


सोमवार, 15 जनवरी 2018

दरवाज़ा


बहुत खूबसूरत थी | भूरी भूरी आँखें , काँधो पर गिरते मुलायम चमकीले बाल | पढ़ने लिखने में भी सबसे अव्वल, पर थी एकदम भोली | 
आजकल की लड़कियों के लिए बोला जाता है कि बड़ी चालाक होती है और उनको कम नहीं समझना चाहिए | 'मिष्टी ' सचमुच में मिष्टी थी | एक दम रोसोगोल्ला | कोई चतुराई  नहीं |    
एक अच्छे पब्लिक स्कूल से बारहवीं और बोर्ड में ९७% मिलना कोई आसान तो नहीं | कानपुर से सीधे दिल्ली यूनिवर्सिटी के लिए रवाना और सबसे नामचीन कॉलेज में दाखिला | 

बहुत खुश थी, मिष्टी | सोशियोलॉजी ऑनर्स मिल गया था बल्कि जहां ही मिल गया था | आई ए एस की तैयारी के लिए परफेक्ट सब्जेक्ट | नया कॉलेज, नए दोस्त , सब कुछ अच्छा अच्छा | इस दिन के लिए तो वह कब से शारीरिक और मानसिक यतन ले रही थी |  

एक बार एक पार्टी में जाना हुआ और वहाँ  मिष्टी के साथ 'ऐसा' हो गया कि वह अपने में घुटने लगी | धीरे धीरे वह बिलकुल चुप होती गयी | एकदम खामोश | छुप छुप कर रोती | मगर अपने दोस्तों के सामने बिल्कुल सहज जैसे कुछ भी न हुआ हो | 
मिष्टी को समझ नहीं आ रहा था अपनी बात किससे साँझा करे ? 
घर में एक दीदी है मगर डरती है कि कैसे बताये ? माँ को तो बिलकुल भी नहीं |  

उसे एक दोस्त याद आया  जिसे वह कानपुर से जानती थी | अपने साथ हुए हादसे को उस दोस्त को  बताना उचित समझा |  बड़ी ही मुश्किल से मिष्टी बता पाती है कि एक पार्टी में कोल्ड ड्रिंक्स में कुछ नशीली गोलियाँ डालकर उसे पिला दिया  गया था  और  फिर उसके साथ गलत काम हुआ | बहुत झिझकते , घबराते हुए कह पाती है, उसका रेप हुआ है | 

मिष्टी अपने दोस्त को बताती है  कि उसे समझ नहीं आ रहा है अब वह क्या करे? वह इस बात को भूलना तो चाहती है पर उसे गिल्टी  महसूस हो रहा है | उसे अपने से नफरत हो रही है | 
उसके दोस्त ने बड़े ही पेशेंस के साथ उसकी बात सुनी | उसने कहा कि ' तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ है लेकिन मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊँगा ' | मिष्टी ने पूछा कि ऐसा क्यों ?

तब उस दोस्त ने जो बताया मिष्टी के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी | उस दोस्त ने बताया कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और उसे जिंदगी से कोई लगाव नहीं है |

उसका रेप हो चुका है, चार बार | उसके माँ की ही सहेली ने उसका रेप किया है जब वह केवल  १५ साल का था |
और यह बात उसके माँ को भी मालूम है | 

मिष्टी सोचने लगी कि क्या पुरुषों का भी रेप हो सकता है ?  क्या पुरुष भी सताये जाते है? पुरुष आखिर मदद के लिए कहाँ जाये?


दरवाज़ों के पीछें से चीख किसी की भी हो सकती है | टार्चर कोई भी हो सकता है | दर्द का कोई लिंग नहीं होता

- निवेदिता दिनकर 
  15/01/2018

  तस्वीर : मेरे क़ैमरे से , एक पुरानी हवेली का पुराना दरवाज़ा , लोकेशन : आगरा