रविवार, 6 मई 2018

तुम्हारे प्यार में








सूरज की अथाह रौशनी
नर्म हरे पत्तों पर
जब जब पड़ी होगी 
तब तब
" तुम" 
और 
ऊँचे, चमकीले हो गए होगे | 

जब पत्तियों से छन कर किरणों ,
 हवा के मीठे झोकों ने ,
"तुम्हारे" 
गर्वीले देह पर 
स्पर्श किया होगा , 

तुम्हारे तन मन में ताज़ा स्फूर्ति दौड़ पड़ी होगी ... 
तो 
कितने पंछियों को 
दर बदर की ठोकरों से बचाया होगा| 
जो तुम्हारी नींद इन के कोलाहल से टूटती होगी 
तो शाम शाखों पर लौटने से बरकत हुई होगी | 

क्या कुछ न समेट के रखा होगा  
तुम्हारे मुलायम छालों ने | 
कितने यादों के सुनहरे पन्ने 
और 
उन पन्नों से निकलती 
सुकून देने वाली 
खस खस की ख़ास करिश्माई खुश्बुओं ने | 

 कहानियों  का जख़ीरा 
या 
जज़्बातों से बहा समुन्दर ...    

मुझे मंजूर है , 
तुम्हारे प्यार में 

' रूमी '
बन जाना  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  ०६/०५/२०१८ 

एक अहम् बात : मेरे घर के सामने खड़े है , यह दरख़्त | एक भयानक आँधी ने इनमे से एक की जान ले ली तब से मन बेहद उदासऔर भावुक है | पहली तस्वीर आँधी से एक दिन पहले की है | कौन जानता था / है , अगले पल को ?


#आत्मखोज  # निवेदितादिनकर

मंगलवार, 1 मई 2018

फर्क




पारा चालीस डिग्री,
पसीने की बदबू , 
मिट्टी में सने कपड़े, 
कीचड़ से लथपथ फटे पैर 
तसले में सीमेंट बजरी मिलाती 
हाथ की चमड़ी उखड़ी हुई  ... 

चेहरे के लिए 
कोई शब्द नहीं दे पायी |  

उदास , खोयी हुई , एक ख़ामोशी 
या कुछ और  ... 

बस ,
सोचती रह गयी  ... 

क्या ' उदासी ' इसे ही कहते है ?

हम तो इंटरनेट नहीं चलने पर उदास हो जाते है 
या 
 एयर कंडीशनर ठंडा नहीं कर रहा हो तो  
या 
आज मेड नहीं आयी हो  ...  

मैं लौटती हूँ , उनके जमीन पर | 

 उनसे 
पूछने पर कि, 
आज क्या तारीख है ?
"पहली "
कहकर चुप |  

बताया जब, आज पहली मई है | 
आओ , तनिक अपने श्रम को मनायें  ... 

एकदम फीकी हँसी होठों पर लातीं है  ... 
नजरें झुका लिया गया   ... 

जैसे मुझे चिढ़ा रहे हो, 
क्या फर्क पड़ता है  ... 

वाक़ई , 
क्या फर्क पड़ता है? 

- निवेदिता दिनकर 
  ०१/०५/२०१८ 
#आत्मखोज  #साइटडायरीज   #निवेदितादिनकर  

तस्वीर : आज के बिताये कुछ कीमती समय , शाहजहाँ पार्क साइट , आगरा 

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

विचारक




महसूस करता हूँ
जैसे,
किसी यातना शिविर में पड़े
कैदी की तरह ...
तो कभी
किसी मानसिक चिकित्सालय में पड़े
मनोविक्षिप्त की तरह ...
जिसे बोलने ,
चलने फिरने
उठने बैठने
के लिए
अनुमति लेनी पड़े ...
साँस भी कब चली जाये
यह भी नियति नहीं ...
अनुमति तय करेगी |
वीभत्सता की पराकाष्ठा,
निर्ममता चरम पर पहुँच कर सोच में पड़ जाये ,
रक्त रिसते रिसते दिशा भ्रम हो जाये ,
घाव की गहराई अनुमान रहित ...
डर और दर्द दोनों सकपकाये हुए
अब तक के सारे मापदंड ताक पर ...
ताक पर ही मशहूर कवियों की ओजस्वी कविताएँ
सबकी सब ठिठकी हुई ...
ठिठके खड़े बांके बिहारी जी,
"अब 'अक्षय तृतीया' पर भी नहीं दिखाऊँगा अपने चरण "...
चरण चरण पर शोध प्रतिशोध ...
घर घर से रुदन गीत ...
मंद मंद मुस्करायेंगे ...
क्योंकि
मैं सिद्धांतवादी हूँ |

 निवेदिता दिनकर 
तस्वीर : " आस "

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यह कैसे हो सकता है?



अच्छा,
जब वह तडफ़ रही होगी ,
तङफ़कर कर चीख़ रही होगी,
हिचकियाँ ले लेकर ...
फिर थक कर
थक कर सुबक रही होगी ,
तब
तब भी तुम्हें ...
तब भी किसी एक को भी ...
... ...
कोई दर्द
कोई अफ़सोस
कोई ग्लानि
नहीं ...
कैसे हो सकता है ?
यह कैसे हो सकता है?
फिर, तुम कौन जाति ?
फिर , तुम लोग आखिर कौन ?
मैं ,
जानना चाहती हूँ ...
पहचानना चाहती हूँ ,
तुम लोग कहाँ से पैदा हुए ?

- निवेदिता दिनकर 
चित्र : देहरादून के रास्ते मेरे द्वारा खींची गयी 

रविवार, 18 मार्च 2018

मन का मौसम



आज मौसम का मन तो मसूरी मसूरी हो रहा है और मन का मौसम चुप। 
कहीं कोई दास्ताँ बरस पड़ा होगा, शायद। तभी खलबली मच रही है। 

अभी इंतेहानों और इंतज़ारी का मौसम है। यानि अप्रैल मई तक परीक्षाऐं खत्म होंगी और बीच में कोई तीज त्यौहार भी नहीं। तब तक हम जैसे ऐसे ही 'इंतज़ार' को सेलीब्रेट करते रहेंगे। बच्चें कभी पढाई तो कभी नौकरी से तारतम्यता के चलते घर फोन भी कहाँ कर पाते हैं। उनकी आवाज़ जिससे धडकती हमारी जिंदगी की हँसी, साँस, गुलज़ार छटपटा जाती है। परन्तु हम अपने दिल की बात कहाँ कह पाते है उनसे, है न ?

 सच है, कि व्यस्त हम सब है कहीं न कहीं। झकझोरती हूँ अवगत कराने के लिए 'अपने' को "अपने" से।

 इमोशंस को उठा कर डीप फ्रिज़ में रखना सीख लिया है मैंने।


 - निवेदिता दिनकर

तस्वीर : मेरे सौजन्य से : गेहूँ की बालियाँ , कछपुरा , आगरा 

बुधवार, 7 मार्च 2018

बच्चें






हर बार बच्चें जब अपनी कॉलेज या नौकरी से छुट्टी ले कर दो तीन दिन के लिए घर आते है , हर कोना घर का किचन के साथ साथ महकने लगता है  क्योंकि कहीं जीरे हींग का छौंक तो कहीं  किस्से कहानियों का छौंक तो कहीं हँसी ठट्टों का छौंक |   

मेरे घर में हमारी 'आपसी बहस' भी बेचारी तरस जाती है, वह भी बैक सीट पर चली जाती है | 

क्या खिला दूँ , कहाँ ले जाऊँ, थोड़ा सा और पास बैठ लूँ , मगर हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है | दोबारा पकड़ने के लिए यह छूटना भी तो चाहिए |  फिर वह फ़ोन पर निबटती है थोड़ा थोड़ा कर |   
अरे, पैसे रख लिए ? सब एक जगह मत रखो ? टिकट रख लिया ?  झुमकी बोलती है, "अरे , पापा , मोबाइल में टिकट है | तुम लोग बेबी की तरह ख्याल रखते हो | "

 उनके कमरे में जाकर 'जैसे वे छोड़कर जाते है ', वैसे ही चीज़ो को रखें रहन देती हूँ |  इस बार से लेकर अगली बार तक के लिए | उनकी छुअन , उनकी नोक झोंक , उनकी अधूरी बातें अगले कड़ी में घुलने तक सब तरो ताज़ा सी | 

एक पड़ाव में आकर फिर आप और आपका साथी, बिलकुल शादी के बाद टाइप लाइफ| वैसे यह मौका या दस्तूर सहेजा जाये ,  उचित अनुचित उपयोग लिया जाये , दुरुस्त एनर्जी का संचार रहता है | सोचा जाये तो , आपसी सहमतियाँ असहमतियाँ होती भी रहनी चाहिए | यह किस्से फिर कहीं |   

पता है , बच्चें अब बच्चे नहीं है पर वह बच्चे रहेंगे |  
बच्चें आत्मा से होते है, सचमुच  ... 

- निवेदिता दिनकर
  07/03/2018

फोटो क्रेडिट्स : दिनकर सक्सेना , "दूर ढलती साँझ "


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

एक सब्र ...




रात ने  किया मुझे बेहद आकर्षित ... 
सर्द रातें तो बिलकुल नवयौवना सी और बारिश प्रेमी 
एक दुसरे के साथ मिल, 
अपनी बेमिसाल खूबसूरती को देते है 
नया रूप  ...  
एक दिव्य रूप | 

मुझे यह जोड़ा बेहद पसंद है | 

एक बेखौफ प्रेमी , 
जो दुनिया के हर दस्तूर से मीलों आगे | 
एक बेपरवाह अंदाज़, 
जिसे मिलने से कोई नहीं रोक सकता |
 एक आग , 
एक छटपटाती रूह जो गर्म लावा  बनकर कर दें सबको भस्म  

सुनों ,
इनके ज़ोर से धड़कते सीने की आवाज़ , 
इनके हाथों के गर्म तालु ,
इनके रौद्र रूप ... 

दुनिया के सिरमौर प्रेमिक कतारों  ... 
हीर राँझा , सोहनी महिवाल , रोमियो जूलिएट , शीरी फरहाद, लैला मजनूं 
इन सबके भौतिकी से कहीं ऊपर |
   
हाँ , 
यह तिलिस्म है | 
इसे शिद्दत से महसूस करना पड़ता है | 
पूरे में भी अधूरे और अधूरे में भी पूरे | 
बंद आँखों से एकदम साफ़ झलकते है |
भौचक्का कर देती है ऐसी दास्तानें | 
एक पाकीज़गी  ...
एक सब्र  ...  

यह जो आशिक़ी है , न | 
मन की आशिक़ी , 
रोम रोम की आशिक़ी ,
दुआओं की आशिक़ी ,
शुकराना की आशिक़ी  ... 

यही इबादत है |
यही नमाज़ है |
यही रोज़ा है | 
यही मक़ाम है | 


- निवेदिता दिनकर   
  २५/०१/२०१८ 

फोटोग्राफी : एक कौतुहल , मसूरी