मंगलवार, 13 नवंबर 2018

कुलधरा



  
राजस्थान का जैसलमेर ज़िला  
निर्माण लगभग १३वीं शताब्दी  ... 
अवशेष देख बेहद रोमांचित हो गयी थी। 

थोड़ी देर ठहरने पर, 
इनके जीवाश्म से आवाज़े 
कानों में गूंजने लगी  ... 
पत्थरों  पर छोड़ी गई छापों से सब कुछ  साफ़ साफ़ झलक जो रहा था।

अजीब आकर्षण सा होने लगा  ... 
उस माहौल की सीली सीली भभक भी मेरे अंदर धीरे धीरे घर करने लगी  ... 

 रसोई से आती खाना पकने की खुशबू  
या 
शोर मचाते बच्चें   
या 
मंदिर से आती टन टन 
या 
दूर बावड़ी से छपाक की आवाज़  ... 

आह  ... 

मैं गहरी निद्रा में जा चुकी थी  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  १३/११/२०१८ 

तस्वीर : मेरे नज़रिये से 

शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

लघुप्रेमकविता ६



तुम्हारी उतारी
'शर्ट'
की खुशबू मुझे बेहद पसंद है |
उसकी गंध मेरे देह में लिपट
मुझे देर तक
भिगोय रखती है |
जैसे
गर्भ में आए 'सद्द शिशु' ...
- निवेदिता दिनकर

सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

थार




इस बार थार से लौटने पर, 
'थार' चला आया साथ घर  ... 

बालू के टिब्बें, ऊंट, भेड़, बकरी,
कोई भी नहीं रहा बाकी  ... 

वह सूर्यास्त का सुनहरा दृश्य,
बलिहारी जाऊँ  ... 
पीछे पीछे वह जनाब भी घर तक | 

कीकर, टींट,फोगड़ा, खेजड़ी, रोहिड़ा
के 
वृक्ष
तो दौड़कर 
मेरे से पहले ही जम गये थे |   

यह एक जटिल परिघटना है |  

अलादीन के चिराग का जिन्न 
फिर प्रकट हुआ है  ... 

माँ के गोद में सर रखकर सुनती 
 'पारस्य रजनी' 
वाली लड़की  ... 

श श श .. 
 ... बस, अभी अभी सोयी है। 

- निवेदिता दिनकर  

तस्वीर : अप्रतिम लालिमा, थार मरुस्थल, जैसलमेर  
            मेरे मोबाइल कैमरे के सौजन्य से 

बुधवार, 26 सितंबर 2018

तुम औरतों से ...




अजीब एक 'गंध' आती है, 
एक दम अलग,

तुम औरतों से ... 

हरे धनिये की ...
या
कच्ची तुरई के पीले फूल की
या
रोप रही मिटटी की ...

तुम्हारी चटक सूती धोती भी न ...
'सिलक' की साड़ी से बढ़िया लगती है |

ऐसे 'खी खी' हँसती ,
जब
कोई तुम्हारी तारीफ़ करें ,
कि बस
पुरवैया इठला जाये ...

सिर ऐसे ढाँकती
जईसे सब मर्द तुम्हारे श्वसुर, जेठ लगें ...

फोटु खिंचवाते टाइम भी
हंसते-हंसते पल्लु से मुंह ढक लेती हो ...

पता है ,
तुम तो

चुपके से उतरती कोई बूँद हो
किसी के पुराने इंतज़ार की ... 


- निवेदिता दिनकर



तस्वीर : मेहनतकश  किसान औरतों से एक रूबरू , लोकेशन : दारुक , वृन्दावन  

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

लघु प्रेम कविता ५




प्रेमिका
से
पत्नी,
पत्नी
से
माँ ...
बनी थी जब ...
और
तुम ...
वह करुण चेहरा
अबोध बालक पन
निरुपाय
असमय ...
हे स्थिति,
तुम मुझे ' शून्य ' कर गयीं
एक पूर्ण विराम ...
"समाधिस्थ" 
- निवेदिता दिनकर
१०/०९/२०१८
#लघुप्रेमकविता५


झुमकी की एक मोहक पेंटिंग 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

लघु प्रेम कविता ४







मुझे अकेले छोड़ कर
तुम्हारा
मात्र 
बाहर जाना
भी ...
जाने क्यों खलता है अब ...

" दे हैव बीन टुगेदर फिफ्टी ऐट इयर्स नाउ "
- निवेदिता दिनकर
  10/09/2018

सोमवार, 10 सितंबर 2018

लघु प्रेम कविता ३


मेरी पीठ से तुम्हारी पीठ
का 
यह
पुल ...

एक 'पीठ' है |

- निवेदिता दिनकर
  09/09/2018
#लघुप्रेमकविता३