गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

मेरी नायिका - 4




बस्ते से निकाल 
अपनी कॉपी ... 
लिखने लगी वह 
ए बी सी डी  ... 

शीत से 
पाँव हो रहे थे बिलकुल ठण्डे ठण्डे 
मगर 
बेख़ौफ़ अरमान चल पड़े थे हौले हौले 

देख, 
तुरंत 
दो जोड़ी मोज़े दिए, 
अरे, ओ हौसलों से भरपूर नन्हें से दीये  ... 
उसने पहना फूर्ती से एक जोड़ी
और 
दूसरा बस्ते में रख दिया  

आह !!

मेरी आज की खूबसूरत नायिका 
नाम वन्दना 
उम्र आठ बरस 
पापा ट्रैक्टर चलाते है  ...    
माँ घर घर काम करती है   ... 

- निवेदिता दिनकर 
   ३१ /१२/२०१५ 

तस्वीर : "एक नन्हीं दीया "

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

मेरी नायिका - 3



आज की शाम ... 
सेब, संतरे, चीकू, अनार 
ठेल बिलकुल भरी हुई 

बराबर से एक और ठेल 
अदरख, लहसुन, हरी मिर्च की 

और ठेल के बराबर से, 
कुछ सहमी
कुछ मुस्काती    
दो जोड़ी चमकीली आँखे ... 

अरे, इतनी ठण्ड में ?
घर जाओ  ...

बराबर से फल वाला धीरे से कुछ बोला 
" माँ  " नहीं है।

सहसा दिल एकदम बैठ गया  ... 
आह!!  
बेहद दुखद  ... 

 मैंने दो दो सेब दोनों के हाथों में रख दिए ... 

मेरी आज की 
दो नन्हीं नायिकाएँ  ... 
एक दूजे से चिपकी खड़ी हुई 
उम्र मात्र आठ - नौ बरस 

-  निवेदिता दिनकर 
   २२/१२/२०१५ 
फ़ोटो : मेरी नज़र से : मसूरी की एक हलचल भरी शाम 

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

मेरी नायिका - २




बहुत प्यारी और नेक सी सुबह थी। 
मीठी मीठी मुस्कराहट संजोऐ 
खिला खिला चेहरा 
कोहरे की चादर ओढे,   
दिसम्बर की कड़क ठण्ड में भी गर्माहट का आभास देती हुई ... 


मेरी आज की नायिका,  
एक पाँच सितारा होटल में लेडीज वाश रूम में ड्यूटी देते हुए 
सत्रह वर्षीय रजनी  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  21/12/2015   

तस्वीर : मेरी आँखों से - कोहरे में लिपटी दार्जिलिंग की एक सुबह  

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

नायिका




वह जब भी मेरे घर के सामने वाली सड़क से गुजरती है, अच्छा लगता है । 
वह जब भी मुस्कुराकर आँखों आँखों से कुछ कहकर निकल जाती है, अच्छा लगता है । 
वह जब भी रुक कर फिर आगे बढ़ जाती है, अच्छा लगता है।

एक दिन आख़िरकार मैंने उसे रोका, और अपनी एक शाल दिया, तो कहती है दीदी, आपने बहुत काम की चीज़ दी है, इस सर्द में खूब काम आयेगी।

ऐसी नज़र अंदाज़ करने वाली घटना या मामूली सी बात कब गहरा चोट कर जाये या फिर कब सबक सिखा जाये या फिर कब रूह से रूह मिला जाये, यह कोई नहीं बता सकता ॥     

यह मेरी नायिका है, मेरी सब्ज़ी वाली  ... 

- निवेदिता दिनकर    
  15/12/2015   

फोटो :" कुछ रौशन दिये" , मेरी नज़र से  

सोमवार, 9 नवंबर 2015

या फिर



क्यों लगता है 
एक दर्द है हमारे प्रेम में 
या 
एक प्रेम है हमारे दर्द में 

जो 
हौले हौले
कम्पन 
बन पनप रहा है  … 

जैसे 
रात की रानी की ठंडी ठंडी खुशबू रात से घुलमिल रही हो 
या 
भोर की ओस नंगे पैरों से लिपट रही हो  
या फिर 
वन की लताओं का आलिंगन लेता विक्षिप्त पुरुरवा  … 

- निवेदिता दिनकर 
  ०९/११/२०१५   

फ़ोटो क्रेडिट्स : उर्वशी दिनकर, लोकेशन : नौकुचियाताल की एक सुबह   

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

आत्मिक प्रेम





और  कल जब तुमने कहा, 

तुम बात करती हो,
जब  
तुम लड़ती हो,
जब 
तुम फ़ोन मिलाकर 
कहती हो,
आना मत  …   
पता नहीं,
मुझे सुकून सा लगता है  … 

चल बुद्धू ,
यह क्या कोई बात हुई  … 
तुम ठिठोली कर रहे हो न ?

नहीं
नहीं …  
बस 
डरता हूँ तुम्हारी ख़ामोशी से … 

तब से 

दीवानी सी उड़ रही हूँ !!

- निवेदिता दिनकर 

फोटो क्रेडिट्स : दिनकर सक्सेना, लोकेशन मंसूरी की मादकता भरी सांध्य


सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

फिर बाँटे



सुनों, 
कुछ शामें मौसिकी के 
कुछ लम्हें आशिक़ी के
कुछ मिठास सर्द के 
और 
कुछ टुकड़े दर्द  के  

एक बार फिर बाँटे ?

- निवेदिता दिनकर 
  20/10/2015   

आज की शाम: गुलाबी सर्द में नहायी मैं और देहरादून 

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2015

एक सवाल


रह रह कर एक घटना याद आती है और फिर कुछ अनसुलझे सवाल।  
आज मैं उस 'वाक़या ' को लिखना चाहती हूँ। 
  
 मई २००८ की बात है । फिरोज़ाबाद से एक शादी का निमंत्रण कार्ड आया था। जाना जरूरी था । 
इसलिए मैं, दिनकर और हमारा  ड्राइवर शाम होते ही आगरा से फिरोज़ाबाद के लिए निकल पड़े। आगरा फ़िरोज़ाबाद की दूरी लगभग ४० कि मी है। और फिर उन दिनों सड़क पर काम चल रहा था इसलिए सड़क बेहद ख़राब व् उबड़ खाबड़।
रात का समय, खैर टाइम से शादी में पहुँच गए थे और घंटा भर रूककर दावत खाकर वापिस आगरा के लिए रवाना हो गए। 

लौटते वक़्त ड्राइवर ने आगरा जल्दी पहुँचने के चक्कर में स्पीड भी बढ़ा दी थी। एकदम से खुरदरी मिटटी से टायर का रगड़ खाने की आवाज़ और कुछ चार पांच मीटर कार का हवा में तैरते हुए सड़क को ज़ोर से पटकते हुए छूना, बस ऐसा लगा कि अब सब ख़त्म  … 

साँसे अटक गई थी और हमने साक्षात मौत को जीता था।    

इस वाक़या के हफ्ते भर बाद यानि १३ मई २००८  की रात्रि हमारे उसी 'ड्राइवर' की आकस्मात मृत्यु का समाचार मिलता है। १४ मई २००८ दोपहर लगभग १२ बजे 'दिनकर' फ़िरोज़ाबाद रोड पर गंभीर रूप से दुर्घटना ग्रस्त हो जाते है। 
थोड़ा सोचने पर मज़बूर हो जाती हूँ क्योंकि ठीक एक हफ़्ता  पहले हम तीन लोग यानि मैं, दिनकर और ड्राइवर साथ थे और एक्सीडेंट टल गया था । 
यानि उस रात किस्मत ने मुझे ही नहीं हम तीनों को बचा लिया था या यूँ कहे, उस वक़्त किसी एक की वज़ह से जान बची था और चूँकि मुझे इन आघातों से बचना लिखा था और आगे जाकर दिनकर को जतन करना था इसलिए कुछ अच्छी शक्तियों की वजह से पहला वाला हादसा टल गया था  …

क्या ऐसा ही था? 

- निवेदिता दिनकर 
  09/10/2015
  
फोटो क्रेडिट्स : उर्वशी दिनकर, लोकेशन - मैसूर के  श्रीरंगपट्ट्ना में 'हम' 

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

दिलेरी



बहुत खलबली चल रही थी कुछ महीनों से 
उसे मिलाना आज ही था … 

यूँ ही तक़दीर नहीं मिलाती कुछ आत्माओं से 
उसे जिलाना आज ही था  … 

- निवेदिता दिनकर 
  08/10/2015  

तस्वीर - दिलेरी की मिसाल रूपा व ऋतु के साथ, Sheroes' Hangout, Agra  

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

विस्थापना




जहाँ अजीब सी आशंका, बेवज़ह की नफरत, हैरान करती फितरत, एक कष्ट मिश्रित भय, 
वहीं एक वाक़या आज अंदर तक अनगिनत इत्मीनान दे गई। 

जब दो दिन पहले अचानक दिल्ली जाना हुआ, तब अपनी प्यारी जर्मन शेफर्ड को एक खास मिलनेवालों के पास छोड़ना पड़ा। लेकिन तीसरे दिन ही उनका फ़ोन आ गया कि वह थोड़ी परेशान हो रही है । हमने तुरंत बैग पैक किया और आगरा रवाना हो गए ।
और जब उसे लेने पहुँचे, उसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है। 

जिस प्रकार वह मेरे से लिपटी और अपनी जुबान में कितनी बातें कह गई कि मेरी सारी थकान दूर हो गई और मेरी आत्मा सोचने पर मज़बूर हो गई कि कहीं शब्द "जानवर" और "इंसान"  विस्थापित  तो नहीं हो गए …   

- निवेदिता दिनकर 
  03/10/2015

नोट:  यह लाड़ली "बनी" है   ...

सोमवार, 28 सितंबर 2015

कैसे भूल सकती हूँ …


सुन बिटिया झुमकी ,
कुछ महीनों पहले तुझे सोचते हुए लिख डाला था । आज मैं पोस्ट कर रही हूँ ।
तू अपने स्कूल की धर्मशाला ट्रिप में खूब खूब मज़े करना। फोटोग्राफी, हाईकिंग, कैंपिंग , गपशप, कूदना, फाँदना सब कुछ पर अपना ख्याल रखना । पापा और मैं इंतज़ार कर रहे है ।

कैसे भूल सकती हूँ,
उन दो पैरेलल लाल लकीरों को …
जब पहली बार देखा ' तुझे '
मैं मंद मंद बहती पवन बन गई
लहराने लगी
झूमने लगी
गाने लगी
सुन री पवन, पवन पुरवैया …


फिर बिंदु
से होकर
आकार …

एक जीवंतता
एक यथार्थ
एक धड़कन
एक तैयारी
एक मिसाल
का आकार

अब साकार होने लगा ...

मैं
प्यासी पपीहरा सी व्याकुल
अपने आगोश में लेने को आकुल


और फिर
एक दुपहरिया,
एक कुहकती चिरैया
न लगे किसीकी नजरिया
बदलने आयी जो नजरिया
बढ़ाने, जीवन का पहिया …
सुन री पवन, पवन पुरवैया …

कैसे भूल सकती हूँ …

- निवेदिता दिनकर
27/09/2015

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

वाह रे, असभ्य मानव!!


कल  के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के फ्रंट पेज की एक खबर,  
मेरठ के पास डिस्ट्रिक्ट बागपत। वहाँ की खाप पंचायत ने बतौर सज़ा दो बहनों को बलात्कार और निर्वस्त्र  कर परेड कराने का आदेश दिया है क्योंकि उनका भाई एक विवाहिता के साथ भाग गया है।     

आज की बेशर्म खबर, 
दुनिया मगर बेखबर, 
कर कलेजे  के टुकड़े, 
रोती शर्म  दिन भर ...

कैसा है यह देश,  
कहरों के कितने वेश, 
यह कैसी सज़ा है, 
खाप पंचायती आदेश ...

फिर से बलात्कार, 
फिर से शर्मसार, 
नहीं आया कोई मुरली,  
 बचाने ददर्नाक चीत्कार ...

काट ही डालो औरत नस्ल, 
नष्ट कर डालों यह फसल, 
न, एक भी न बच पाये कहीं!
वर्ना यह कल देंगी तुम्हें मसल...
धूर्तता की मिसाल हम, 
लाश को ढो रहे है हम, 
बस कर रहे है ढोंग, 
जीने का सबब हम ...

बस कर रहे है महा ढोंग, 
जीने का अजीब सा सबब हम ...

- निवेदिता दिनकर 
  01/09/2015

तस्वीर साभार गूगल : गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की एक बेमिसाल पेंटिंग 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

ऐ ज़िन्दगी



सुनो,
मुझे हँस लेने दो 
जी भर भर ...

मुझे जी लेने दो 
मन भर भर ...

- निवेदिता दिनकर 
  19/08/2015

तस्वीर : ' दिनकर ' के आँखों से ...

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व सुबह







आज की खूबसूरत और नज़ाकत भरी सुबह, स्वतंत्रता दिवस की पूर्व सुबह, मासूमियत में लिपटी रही।  
हुआ यूँ  कि एक संस्था ISHRAE की मेंबर होने  की वजह से K 12 की चेयर हूँ  जिसके अंतर्गत एक प्लेग्रुप में जाने का सुखद मौका मिला। सच में, एक अरसा बीत गया था । 
 
आह हा …
फूलो से भी नाज़ुक प्यारी प्यारी कलियाँ,
मीठी मीठी तोतली तोतली तुम्हारी यह बोलियाँ, 
अरे जिगर के टुकड़ों, 
कहीं तुम्हें मेरी नज़र न लग जाये, 
हसरतें है चाँद पर साथ चलते जाये…  

- निवेदिता दिनकर 
  14 /08 /2015

बुधवार, 12 अगस्त 2015

तिरंगा



तिरंगे को देख 
जज़्बाती होना,
गर्व से माथे का उठना 
एकदम  स्वाभाविक … 

कितने गौरवशाली गाथाएँ, 
कितने कलेजे के टुकड़ों की कुर्बानियाँ, 
कितने धधकते अंगार,
कितने चरम पंथी  …
और 
कितने ही नरम पंथी  …

आसमान से ऊँची,
समुन्दर से गहरी,  
मेरा अभिमान,
मेरा स्वाभिमान,  
वन्दे मातरम   …
वन्दे मातरम  …

- निवेदिता दिनकर 
  12 /08 /2015 

फ़ोटो क्रेडिट्स : दिनकर सक्सेना , 'तिरंगा', लोकेशन : मदर्स वैक्स म्यूजियम , कोलकाता  

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

क्या बरसी हो!!






क्या बरसी हो, आज !!
जाने,
क्या क्या बरसा दिया, आज !!
अरे,
कोई ऐसे भी बरसता है, क्या ?

थम थम के बरसी …      
बरस बरस के थमी  … 
कभी ठिठकी 
कभी भटकी 
कभी छिटकी
कभी सिमटी 

ऐसा लगता है मानों, 
मानों 
यौवन फूट पड़ा हो 
और 
अपनी मादकता से सबको मदहोश करने का इरादा हो ॥ 

ज़रा हौले से, 
यह महज़ 
बूँद नहीं है  … 

प्यास है हमारी … 
रूह है हमारी  … 
   …

- निवेदिता दिनकर  
  07/08/15

फ़ोटो :  हमारी नज़र से, आज दुपहरिया में बरसी यह नासमझ " बूँदे " 

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

माय बेस्ट फ्रेंड







हाँ, बेस्टेस्ट फ्रेंड तो आप ही हो और रहोगे …  

और यह शत प्रतिशत सच है, पर, फिर भी लगातार अपनी उपस्तिथि दर्ज़ कराते रहते हो।
यूँ तो आप पैंट शर्ट में भी हैंडसम लगते हो  मगर सबसे ज्यादा आपके ऊपर सफ़ेद एम्ब्रॉयडर्ड कुर्ता पायजामा ही जंचता है।   

देखो न, अब जब कल मैंने आपको वहीं कलफ़दार कुर्ते पायजामे में चाय पीते हुए देखा, सहसा विश्वास नहीं हुआ। पूछ ही डाला, आप तो 2011 में चले गए थे , न …   तो , इतने दिन कहाँ थे ? आप मुस्कराये , फिर बोलते है … "मैं तो हमेशा ही तुम्हारे आसपास हूँ ।" 

पता नहीं, पर 'बापी', आजकल आप रोज़ मेरे सपनें में आ रहे है, और कल जो हमारी बातचीत हुई , वह दिमाग से जा ही नहीं रही है। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे एकदम सचमुच   … 
शायद आपके आखिरी वक़्त में आपके पास नहीं होने की वजह से, मैं आपके स्नेह के लिए बेचैन हो उठती हूँ। कितनी बातें बांटने को है   …  

भीड़ में ढूढ़ती हूँ आज भी   … 
और किसी कच्चे पक्के बाल वाले कुर्ते पायजामे वाले को मुढ़ मुढ़ कर देखना नहीं भूलती, कि क्या पता …  !!

तुम्हारी लविंग डॉटर 

- निवेदिता दिनकर 
  04/08/2015

नोट : दोनों तस्वीरों के बीच लगभग २५ साल का फासला है …  " पिता पुत्री " 

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

कलाम सर



कलाम सर,
पहली बार ऐसा हुआ है , जब हर धर्म की मानव जाति , हर पार्टी का राजनेता, कोई भी आयु वर्ग, स्त्री, पुरुष , बच्चे, शिल्पकार, साहित्यकार , डॉक्टर , वैज्ञानिक या कुछ और, प्रत्येक जन मानस , आपके लिए दिल से रोया है। 

कहते है, अगर जानेवाला घर गृहस्थी वाला है, तो उसके लिए उसका पूरा परिवार शोकाकुल होता है, परन्तु आप तो ऐसे जादूगर निकलेप्यार के इतने धनी निकले जिसने पूरे राष्ट्र को एक सूत में बाँध दिया। 

इस सन्दर्भ में एक वाक़या याद आ रहा है । 
माँ शारदा ने एक बार स्वामी राम कृष्ण परमहंस से कहा कि मुझे अफ़सोस है कि मुझे माँ कहनेवाला कोई नहीं है। इस पर स्वामी जी कहते है कि इस बात की आप बिलकुल चिंता नहीं कीजिये, आपको पूरा जगत माँ पुकारेगा।

सर, आपको मेरा शत शत प्रणाम । आज, कल और हमेशा      

निवेदिता दिनकर   
 30/07/2015

नोट : पेंसिल स्केच की एक अदना सी  कोशिश 

सोमवार, 27 जुलाई 2015


अब बस !




चलों न कहीं, 
बहुत दूर ...

देखों न सही, 
वह नारंगी धधकती शाम...

कब से बुला रही  … 
और 

तुम हम 
एक दास्ताँ के कोख़ में   … 
हमेशा के लिए ...

कि
अब बस! 
हमें अजन्में ही रहने दिया जाए!!   

-  निवेदिता दिनकर   
    27 /07/2015

फोटो : मेरे द्वारा कालका ट्रैन से लिया गया …     'एक धधकती शाम'     

शनिवार, 25 जुलाई 2015

भ्रम



सब कहते है,
आज कल प्रेम जैसा कुछ नहीं
सब भ्रम... 

मग़र ख़ामोशी से 
तुम मुझे भ्रम में रखो !
मैं तुम्हें प्रेम में रखूँगी !!

- निवेदिता दिनकर 
  25/07/2015
फोटो क्रेडिट्स दिनकर सक्सेना , लोकेशन भीमताल झील के किनारे 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

सहोदरी सोपान -२ पुस्तक का लोकार्पण






गौरवान्वित हूँ ...


क्योंकि 'भाषा सहोदरी हिंदी' द्वारा १२ जुलाई को काव्य गोष्ठी एवं १३ जुलाई को सहोदरी सोपान -२ पुस्तक का लोकार्पण की मैं प्रतिभागी व साक्षी रही। ख़ुशी की बात तो है जब अनोखी बातें, अपनत्व भरी मुलाकातें हुई हो । 


जब फेसबुक वाल से मित्रगण जमीनी हकीकत पर रूबरू होते है तो जज़्बातों का आदान प्रदान होता ही है और सच मानिए हुआ भी। 

नामचीन साहित्यकारों को सुनना और फिर उनसे बातचीत कर, प्रफुल्लित महसूस कर रही हूँ । शायद इसलिए और भी क्योंकि मेरे लिए यह सब रोज़मर्रा की चीज़ तो है नहीं तो क्यों न पलों को जीते रहे और खुद के साथ जीवित रखे … 
आमीन 


- निवेदिता दिनकर
  16/07/2015

शनिवार, 4 जुलाई 2015

देहरादून





कुछ दिनों पहले की बात है।  मैं बेटे के पास देहरादून गई हुई थी। देहरादून अपने आप में खूबसूरत शहर के साथ मिज़ाज़ का भी नायाब शहर है । गर्मियों में सुखद मौसम का मज़ा और प्राकृतिक ठंडक हो तो, बस और क्या चाहिए !!

यूँ ही अकेले नए शहर में घूमने का आनंद ही कुछ और है। लम्बे लम्बे दूर तक चलते रास्ते, आकाश चूमते पेड़,  न किसी से जान पहचान , न किसी की दुआ सलाम , बस अपने मन से निकल जाओ। जहाँ मर्ज़ी रूककर किसी अजनबी से थोड़ा उस एरिया का आईडिया ले लेती थी तो  कभी किसी बच्चा बौद्ध भिक्षु को देखकर उनके साथ सेल्फ़ी लेती तो कभी किसी फल वाले के साथ फल खरीदने के बहाने बातचीत,  एक अजीब सी आत्म संतुष्टि सी होती थी। 

खैर, उस दिन भी मैंने सोचा, चलो, जाकर उस फल वाले से बतियाते है और मैं निकल पड़ी। आम का मौसम है तो क्यों न आम खरीदा जाये और फिर उस फल वाले से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। 'क्या आप मुसलमान है' फल वाले मियां साहब ने पूछा तो मैं चौंकी, फिर मुस्करा दी। मैंने पूछा ' क्यों '। 'मुझे लगा आप हमारी बिरादिरी की है । आपको देखकर ऐसा ही लगता है।' बड़े कॉन्फिडेंस के साथ मियां जी बोले  … 

मैंने भी सोचा, ठीक ही तो है । तपाक से बोली 'रूह से' और दोनों ज़ोर से हँस पड़े। 

- निवेदिता दिनकर 
  ०४ /०७/२०१५