सोमवार, 27 जुलाई 2015

अब बस !




चलों न कहीं, 
बहुत दूर ...

देखों न सही, 
वह नारंगी धधकती शाम...

कब से बुला रही  … 
और 

तुम हम 
एक दास्ताँ के कोख़ में   … 
हमेशा के लिए ...

कि
अब बस! 
हमें अजन्में ही रहने दिया जाए!!   

-  निवेदिता दिनकर   
    27 /07/2015

फोटो : मेरे द्वारा कालका ट्रैन से लिया गया …     'एक धधकती शाम'     

3 टिप्‍पणियां:

  1. अब बस अजन्मे रहा दिया जाए ........ !!
    बहुत सुन्दर !!

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    1. आपका आना, रचना को पसंद करना अच्छा लगा, धन्यवाद जी ...

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