शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

क्या बरसी हो!!






क्या बरसी हो, आज !!
जाने,
क्या क्या बरसा दिया, आज !!
अरे,
कोई ऐसे भी बरसता है, क्या ?

थम थम के बरसी …      
बरस बरस के थमी  … 
कभी ठिठकी 
कभी भटकी 
कभी छिटकी
कभी सिमटी 

ऐसा लगता है मानों, 
मानों 
यौवन फूट पड़ा हो 
और 
अपनी मादकता से सबको मदहोश करने का इरादा हो ॥ 

ज़रा हौले से, 
यह महज़ 
बूँद नहीं है  … 

प्यास है हमारी … 
रूह है हमारी  … 
   …

- निवेदिता दिनकर  
  07/08/15

फ़ोटो :  हमारी नज़र से, आज दुपहरिया में बरसी यह नासमझ " बूँदे " 

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-08-2015) को "भारत है गाँवों का देश" (चर्चा अंक-2062) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. मैं शुक्रगुज़ार हूँ रूपचन्द्र शास्त्री जी ...

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  2. उत्तर
    1. आपको मेरे भाव अच्छे लगे, जी , आभार

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  3. हम वर्षा के साथ साथ आपकी कविता का आनन्द भी ले रहें हैं.

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    1. अरे … क्या कहने आपका , रचना जी ...
      आभार :)

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