सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

फिर बाँटे



सुनों, 
कुछ शामें मौसिकी के 
कुछ लम्हें आशिक़ी के
कुछ मिठास सर्द के 
और 
कुछ टुकड़े दर्द  के  

एक बार फिर बाँटे ?

- निवेदिता दिनकर 
  20/10/2015   

आज की शाम: गुलाबी सर्द में नहायी मैं और देहरादून 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (21-10-2015) को "आगमन और प्रस्थान की परम्परा" (चर्चा अंक-2136) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. क्यों नहीं...निवेदिता.... जरुर -- बहुत दिलकश तोहफा... बांटना ही होगा -

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