रविवार, 22 जून 2014

आज

सहेज कर 
एहसास में लिपटा
वह सूखा सा फूल, 
फटे से कागज़ पर
लिख जाना 
मेरा नाम,
न कहने पर 
तुम्हारे होठों का 
बेबस हो सूखना, 
आज सब 
सोचने का मन कर रहा है …  
प्रेम की तपिश क्या केवल दो बाँहो के दरमियान ही पनपती है? 

- निवेदिता दिनकर 
  २२/०६/२०१४ 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  2. खूबशूरत भाव और शब्द संयोजन...बेहतरीन अभिव्यक्ति

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