शुक्रवार, 13 जून 2014

आँधी


आँधी के साथ एक जूनून, नहीं शायद एक मिटटी का एहसास, कह रही हो 
सब एक दिन धूल हो जाना है । 
मैंने कहा, ऐसे कैसे ?
अभी अंदर की "आँधी" का आना बाक़ी है, दोस्त॥


- निवेदिता दिनकर

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. शास्त्री जी, नमस्कार!
      आपको अच्छी लगी, जानकर हर्ष हुआ। हमारा शुक्रिया स्वीकारें।

      निवेदिता दिनकर

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