शनिवार, 14 जून 2014

लहर


उफ्फ...
यह लहर, 
फिर लहर, 
और 
फिर एक लहर... 
हर पहर

लहर लहर...
आत्म मुग्ध
यह लहर...
क्षण भंगुर
है लहर,
फिर भी
लहर लहर... 


- निवेदिता दिनकर

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-06-2014) को "बरस जाओ अब बादल राजा" (चर्चा मंच-1644) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. लहर लहर हर पल हर प्रहर
    कुछ कहती सी, बहता चल न ठहर।

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  3. मित्रों, बहुत ही ख़ुशी होती है जब आप जैसे साहित्यकार मेरे ब्लॉग पर आते है और हौसला अफजाही कर जाते है , बहुत शुक्रिया
    आपकी,
    निवेदिता दिनकर

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