सोमवार, 25 अप्रैल 2016

लेबल



सुनो बंधु ,
आज तक तुम मुझे लेबल देते रहे   
'अशुद्ध' का 
और 
प्रतिबन्ध लगाते रहे 
मेरे हर मार्ग पर ...

पर 
अपने को न बचा पाए 
और सिद्ध हुए 

एक अशुद्ध से जना ... 
एक जना ... 

- निवेदिता दिनकर 
  25/04/2016

फ़ोटो क्रेडिट्स: उर्वशी दिनकर  

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

कुछ पल


२०११ में लिखी थी, आप भी महक लें   ...

खूब थी वह खूबसूरत याद ..........
बेमिसाल बेहिसाब बेकाबू
जाने अनजाने बस गयी
भीनी मंद मंद मीठी मीठी
सराबोर कर के आज ...........

जैसे 
धुएँ के छल्लों में 
पहली कश ...
खूब थी वह खूबसूरत याद ..........
---" कुछ पल जो संजोये है...."

- निवेदिता दिनकर 
   ०९/०४/२०१६ 
तस्वीर: उर्वशी के हाथों का जादू ...  

रविवार, 20 मार्च 2016

दोस्ती के कितने रंग




दोनों एक बार फिर जन्में  ...

अधूरे थे 
पूरे हो गए ...

शायद 
कोई पुराना हिसाब बकाया था !!

- निवेदिता दिनकर 
   20/03/16 

सन्दर्भ : १६/०३/१६ को एक दुर्घटना में सचमुच हम( मैं और बनी) बाल बाल बचे  
तस्वीर : शैतानी करती "बनी", फ़ोटो क्रेडिट्स : उर्वशी दिनकर  

मंगलवार, 15 मार्च 2016

बेबुनियाद बातें



हमेशा काम की बातें
 या
 मतलब की बातें 
या 
फिर जरूरी बातें 
या
ऊँचे दर्जे की बातें ...  
कभी बेमतलब की या बेबुनियाद या गैर जरूरी बातें क्यों नहीं?

मसलन 
घर में कौन कौन है?
बेटी कितनी बड़ी हो गयी है?
स्कूल जाने लगी की नहीं? 
बेटे को बिगाड़ना मत ... 
उसकी चोट ठीक हो गयी की नहीं ... 
रुकसाना कैसी है?
अब और बच्चें मत पैदा करना !!
अम्मी ने क्या खाना बनाया?
अब्बू की खाँसी कैसी है?
तम्बाकू खाना कब छोड़ रहे हो?
वगैरह वगैरह ... 

आज कल यही बे सिर पैर की बातें कर रही हूँ 
और 
और 
फिर जगह जगह इन आधी अधूरी बातों की पैबंद लगा खूब जी रही हूँ  ...

बड़ा ही सुकून है, सचमुच  ...

- निवेदिता दिनकर     
  १५/०३/२०१६ 

सन्दर्भ : राह चलते मजदूरों से बतियाते हुए  
तस्वीर: देहरादून में कुछ बच्चें भिक्षुकों के साथ 

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

चमत्कार



"अब मेरी पवित्रता भी तुम तय करोगे! 
क्योंकि यहीं परंपरा है!!" 

तो  ऐसा करों, 

सहनशीलता की मूरत बन के दिखाओ ...
नौ महीने कोख़ में रखो ...
संतान जनो ...  

 बस!!!  

वर्ना
बुला लाओ, सब धर्म गुरुओं को   
शायद, कोई चमत्कार हो जाए ...   

- निवेदिता दिनकर 
  १०/०२/२०१६ 

सन्दर्भ : स्त्रियों का शनि मंदिर, सबरीमाला मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध 
तस्वीर : उर्वशी दिनकर, लोकेशन : रामोजी सिटी, हैदराबाद  


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

बर्फ ही बर्फ



एक : "जब मैं छोटा था, फ्रिज में से बर्फ निकालकर एक दूसरे भाई बहनों पर फेंका करता  था।"

दूसरा : "जब मैं छोटा था, हमारे घर में फ्रिज नहीं था और हम पड़ोस के घर से बर्फ लाकर शिकंजी में डाल कर पीया करते थे।"

तीसरा : "जब ठण्ड के मौसम में माँ मुझे रात को कहानी सुनाकर सुलाया करती थी, तो मैं उनसे चिपट कर गहरी नींद में सो जाया करता था।" 

चौथा : "जब  मैं मम्मी पापा के साथ गुलमार्ग घूमने गया था, कैसे मैंने बर्फ के गोले बनाकर अपनी बहन पर डाला था।"    

सारे : "मगर, क्या आज  हम इस बर्फ के कहर से बाहर निकल पाएँगे ??"

- निवेदिता दिनकर  
  ०४/०२/२०१६  
सन्दर्भ : सियाचिन ग्लेशियर 
तस्वीर : उर्वशी दिनकर, लोकेशन : भीमताल  

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

क्या नाम दूँ ?




यह तुम्हारे नर्म एहसासों का बोसा है 
या 
गुदगुदाते आगोश की संगमरमरी उल्फ़त      
या 
बेज़ुबान इश्क़  ...  

- निवेदिता दिनकर 
०३/०२/२०१६ 

तस्वीर :  उर्वशी दिनकर की आँखों ज़ुबानी  "बेज़ुबान इश्क़"