सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यह कैसे हो सकता है?



अच्छा,
जब वह तडफ़ रही होगी ,
तङफ़कर कर चीख़ रही होगी,
हिचकियाँ ले लेकर ...
फिर थक कर
थक कर सुबक रही होगी ,
तब
तब भी तुम्हें ...
तब भी किसी एक को भी ...
... ...
कोई दर्द
कोई अफ़सोस
कोई ग्लानि
नहीं ...
कैसे हो सकता है ?
यह कैसे हो सकता है?
फिर, तुम कौन जाति ?
फिर , तुम लोग आखिर कौन ?
मैं ,
जानना चाहती हूँ ...
पहचानना चाहती हूँ ,
तुम लोग कहाँ से पैदा हुए ?

- निवेदिता दिनकर 
चित्र : देहरादून के रास्ते मेरे द्वारा खींची गयी 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-04-2017) को ""चुनाव हरेक के बस की बात नहीं" (चर्चा अंक-2943) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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