शुक्रवार, 17 मार्च 2017

सीढ़ियाँ



एक खिंचाव सा महसूस किया, इस तस्वीर को देख कर ।
जाने क्यों लगा जैसे बरसों इन सीढ़ियों पर बैठी रही हूँ । यहाँ से गुजरते हवाओं से बातें करी हो , चाँदी सी झिलमिलाती इस झील से कोई पुरानी मुलाक़ात हो, अपनी ख्वाइशें  इन सबसे साँझा की हुई हो।   

बीती हुई बातें, रीती हुई रातें सताती बहुत है। कई अनकही कहानियाँ जो थामे होती है। 
गीली मिट्टियाँ और उस पर कदमों के निशां आज भी दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे 
कोई मुझे पुकार रहा है, और, और मैं नंगे पाँव दौड़ी चली जा रही हूँ  ...    

 - निवेदिता दिनकर 

फ़ोटो क्रेडिट्स : उर्वशी दिनकर  

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-03-2017) को

    "दो गज जमीन है, सुकून से जाने के लिये" (चर्चा अंक-2607)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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