बुधवार, 4 जनवरी 2017

पूस की एक रात




हर रात एक कहानी बुनती हूँ 
या 
हर कहानी में एक रात बुनती हूँ  

मगर, 
आज की रात 
एक सर्द रात  
निस्तब्ध 
सफ़ेद 

अकेली   ... 
अधूरी  ... 
अलबेली  ... 
अनोखी  ... 
अलौकिक  ... 

हल्कू, जबरा
आज भी वैसे ही,  
 
बिलकुल भी नहीं बदले ...    

कुछ नहीं बदला  ... 
  
- निवेदिता दिनकर 
  04/01/2017

तस्वीर : मेरे द्वारा "पूस की अलौकिक रात", लोकेशन : आगरा  

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