बुधवार, 21 मई 2014

वह भीगी रात


कितनी खूबसूरत बात है, 
कितनी मनमोहक रात है, 
मन करता है … 
रोक लू इसे, 
न जाने दू कभी ,
यु ही तुम्हारे 
साथ… 
स्पर्श की आंखमिचौली,
खुशबूओं की होली …  
सिहरन का आलिंगन, 
कौंधती बिजली सा बदन  …  
दर सिलसिला 
बना रहे 
और 
हम 
कभी बाहर 
न निकल पाये ॥  

काश, तुम समझ पाते!!

- निवेदिता दिनकर 

1 टिप्पणी:

  1. अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

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