गुरुवार, 9 जनवरी 2014

फिलहाल

यूँ  तो हर ओर 
अधूरापन, 
रिश्तों में सिलवटों 
का आवरण  …
टुकड़ो में पलता 
जीवन प्रभंजन  … 
दौड़ता दौड़ाता 
निर्झर 
क्लांत 
अंतर्मन …
बस ,
अब सृजन 
हो जाने दे, 
कोमल पत्तो को  
भीग जाने दे, 
फिलहाल
जी  लेने  दे । 

'फिलहाल'
जी  लेने  दे ॥ 

- निवेदिता दिनकर 

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (11-1-2014) "ठीक नहीं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1489" पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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    1. शुक्रिया मेरी रचना "फिलहाल "चुनने के लिए ... राजीव जी

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    1. पधारने के लिए आभार, निहार जी ॥

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    1. , बहुत अभिभूत हूँ, सुशील जी

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    1. .यूँ ही स्नेह बनाए रखिएगा, ओंकार जी ॥

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    1. कुछ अपने कीमती वक़्त दिए, कालीपद जी
      ....शुक्रिया ।

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  6. उत्तर
    1. आपके कमेंट के लिए धन्यवाद, रश्मि जी |

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