शनिवार, 24 अगस्त 2013

तृष्णा

जानू न.…. 
कब से ??
कितने कृष्णयुग पार .….  
कितने जनम जन्मान्तर,
कितने  देहली , 
कितने पहेली  … 
कितने घात ,
कितने आघात  …  
कितने आस ,
कितने  परिहास   … 
कितने घेरे ,
कितने फेरे  …

शनै: शनै: …… . 
एक दिलासा,  
एक  अभिलाषा ….  
एक किसलय,  
एक समय .....
एक निवेदन 
एक आवेदन, 
एक  प्रभंजन ..... 
एक निरंजन, 
एक तृष्णा,
एक कृष्णा !
हरे तृष्णा,
हरे कृष्णा !! 

  
- निवेदिता  दिनकर

2 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल भिन्न ....मारक रचना ....लाजवाब

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  2. निशब्द , देरी के लिए माफ़ी शिखा, ... बहुत शुक्रिया तुम्हारा

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