शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

धूप







रेंगते हुए उतरता धीरे-धीरे वह कतरा धूप का,
दरख्त के ऊपरी छोर से बिन आहट के,
हल्के नीले आसमां का रंग भी बदला बदला,
बादलों के टुकड़ों ने भी रंजिशें कर लीं है
और
मैं खयालातों के नरगिसी बगीचें में
'अपने'
साथ खिल खिल हँस रही हूँ।
शिराओं से दर्द भी उतरता जा रहा है
मंद मंद ...
बिल्कुल गर्भ से शिशु के बाहर आने सा...


- निवेदिता दिनकर

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (22-07-2018) को "गीत-छन्द लिखने का फैशन हुआ पुराना" (चर्चा अंक-3040) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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