शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

और जब ...



अजीब सनक है 
या 
सनकी कहो 

न भेड़चाल पसंद 
और 
न भीड़ वाले काम ...

फितरत ही नहीं है ...
कही जाती हूँ 
हठी 
बेअदब 
बेशर्म 

जब रुकना चाहती हूँ 
कहा जाता है 'चलो'

और जब चलना चाहती हूँ 
कहा जाता है 'रुको '

जब बात करने का मन होता है 
तो 'कितना बोलती है'! 

और 
जब खामोश 
तो 
ज़लज़ला ... 

- निवेदिता दिनकर 
   १५/०१/२०१६ 

तस्वीर : उर्वशी की आँखों से 'स्फुटित' 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-01-2016) को "सुब्हान तेरी कुदरत" (चर्चा अंक-2224) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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