शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

तब्दील

क्या क्या कहूँ, 
कैसे कैसे कहूँ ,
कि 
इतनी मिटटी 
तो डाल ही चुके हो 
अब तलक … 

मेरे चीखों और छटपटाहट की 
कब्र पर  … 

कि 
सब अस्थि पिंजर में कबका तब्दील हो चुके होंगे !!

- निवेदिता  दिनकर 
  २८/०२/२०१५ 

फोटो क्रेडिट्स - उर्वशी दिनकर,  लोकेशन आगरा 

3 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-03-2015) को "बदलनी होगी सोच..." (चर्चा अंक-1905) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. चिगारियाँ राख में ही उठती हैं ...
    संवेदनशील शब्द ....

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  3. बहुत सुंदर प्रस्‍तुति। मैं श्री दिगम्‍बर नसवा जी से सहमत हूं कि चिंगारियां राख में ही उठती है।

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