बुधवार, 8 मई 2013

पीड़ा


कभी कोशिश भी न करना 
छूने की तुम 
कराह न उठे बेचारी 
असहाय सी  मारी मारी 
शरीर को चीरती हुई 
डरी सहमी सी 
फूट न पड़े टीस कहीं 

आह , वह प्रचंडता 
दिया  जो  तुमने
कैसे  मैंने मन ही मन 
रोक अंतर्मन 
अपने को सम्हाला
नारंगी सी ज्वाला 
जो भीतर घर कर चुकी थी 
आहिस्ता  आहिस्ता

अपने रुख की ओर .....

परत दर परत 
दबी हुई सिसकियाँ 
निस्तब्ध  खामोशियाँ 
जाने कितनी  आहे 
लिपटी हुई 
मजबूती से 
जलती  रही , 
जलती  रही .......
  
- निवेदिता दिनकर 

10 टिप्‍पणियां:

  1. निवेदिता : दर्द का दस्तावेज...!! बहुत खूब. एक बात प्रचंडता 'दी जाती' है, 'दिया नहीं जा' सकता.

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    1. आपका कमेंट सर आँखों पर, Raju!! बहुत शुक्रिया ......

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    1. .आभार .....बहुत ही अच्छा लगा, अनु !!!.

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  3. बहुत सुन्दर कविता . आपके इस पोस्ट का प्रसारण ब्लॉग प्रसारण
    के आज 20.05.2013 के अंक में किया गया है. आपके सूचनार्थ.

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    1. Neeraj Ji, मेरी रचना पसंद करने के लिए शुक्रिया । और बहुत सारा आभार ...मेरे पोस्ट को ब्लॉग प्रसारण में शामिल करने के लिये…. ..

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  4. वेदना की सुन्दर अभिव्यक्ति. कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें.

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  5. बहुत नाज़ुक प्रतिक्रिया , शिखा … शुक्रिया,

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