गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

प्रवाह





ऐसा क्यों लगने लगा 
ज़मीं  थमने लगी 
आसमां बुझने लगा 
गति नहीं रही 
दम निकलने सा लगा 

चंद  अफ़सोस लगे झकझोरने  
मन भी लगा सिसकने 
दर्द बयान से होने लगा बाहर 
बेबसी ने कर लिया  घर 
घुटने लगा शरीर 
तन  मन सिहर  

मगर बहना तो पड़ेगा 
तप तप  के जीना तो पड़ेगा 
कठोरतम  हो होकर
सहना  तो पड़ेगा 
प्रवाह को हमसफ़र
हमसफ़र को प्रवाह 
बनाना तो पड़ेगा ।
बनाना तो पड़ेगा ।।
बनाना तो पड़ेगा ।।

- निवेदिता दिनकर   

2 टिप्‍पणियां:

  1. निवेदिता जी - बेबसी का, असहायता का सुरेख वर्णन--धन्यवाद.

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  2. प्रिय राजू , आपने मेरे रचना के लिए जिन शब्दों से उत्साहवर्धन किया , उसके लिए मैं अनुग्रहित हूँ । ऐसे ही मुझे प्रेम ,आलोचना ,ज्ञान से नवाजते रहिएगा, आभार !! बाकी और रचनाओ पर भी आपके काम्मेंट्स की ख्वाइश है , धन्यवाद ।

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