गुरुवार, 12 मार्च 2015

मेरी ख़ुशी


आसमान में उड़ते उड़ते  
बादलों के संग अठखेलियाँ करने लगी  …  
तब, 
उधर से गुजरती एक चिड़िया बोली 
अरे, तुम !!
मैंने कहा, हाँ …  
आज मैं बहुत खुश हूँ। 

अब 
मैं बूंदो से दोस्ती करूंगी, 
पुरवैया मेरी सहेली बन गई है,  
अनजान रास्तों पर कूदूंगी फाँदूंगी  …
अमरुद के पेड़ पर चढ़ अमरुद तोड़ूँगी, 
झुकी टहनियों से लटकूँगी, 
अमावस रात में चाँद ढूँढूँगी,

और   

सदियों से जमी बर्फ बनकर पिघलूंगी … 

-  निवेदिता दिनकर  

पेंटिंग  : साभार गूगल 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-03-2015) को "माँ पूर्णागिरि का दरबार सजने लगा है" (चर्चा अंक - 1917) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ही सुंदर कविता।

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