रविवार, 26 मार्च 2023

मात्र मात्राओं का खेल है ...










 पहली बार हाथ में अपनी पुस्तक '' मात्र मात्राओं का खेल है '' को थामना  ... 

भावुक करा गया  ... समझ ही नहीं आ रहा था कि उसमें मुझे देखना क्या है!! 
कवर, पृष्ठ, सज्जा , रचनाएं या ख़ुश्बू  ... 
पुस्तक में लिखी रचनायें गत दो तीन बरस की है  ... पुस्तक का रूप धारण करने से पहले समय विचारों/ शब्दों/इंतज़ार ने बहुत गोता खाया/ लगवाया | 

आवरण बेटी उर्वशी दिनकर ने मधुबनी आर्ट्स के ज़रिये सजाया है | 

2020 से लेकर 2022 तक या यूँ तो अभी भी कई कठिन परीक्षाओं का सामना करना पड़ा या पड़ रहा है |  नतीजे की चिंता करने का कोई समय नहीं था , सो धड़ाधड़ इन्तेहां दिए जाती रही  ...  राहत की अब हमें फ़िक्र भी नहीं | 
दर्द को अब माशूका जो  बना लिया है  ... 
पुस्तक बनाने की प्रक्रिया बनते बनते छूटती रही , कई प्रकाशकों ने  न बोलना था, सो उनको माफ़ किया, कुछ माफ़ी अभी रस्ते में हैं ,  पर यात्रा कायम रही  ... 

२ जनवरी , २०२३ अनुराग वत्स जी से पहली बार बात हुई  ... 
जाने माने नोशन प्रेस के युवा संपादक से हुई छोटी सी बातचीत ने इतना ईंधन का काम किया कि  मात्र महीने भर में  ४१ रचनाओं सहित काव्य संग्रह  '' मात्र मात्राओं का खेल है '' हम सबके समक्ष  ... 
उनके एक और साथी आदर्श भूषण भी वाक पटु  ... यानि एडिटोरियल टीम ऑफ़ नोशन प्रेस रॉक्स  ... 

दोस्तों , कुछ तस्वीरें जो बेटी ने खींची है , यह क्षण भविष्य के ख़ातिर क़ैद किये  जाने जरूरी थे |
दुलार से मित्रों की अपनी भेजी हुई भी तस्वीरें हैं |  

#मात्र मात्राओं का खेल है   #निवेदिन  #नोशन प्रेस  




बुधवार, 21 दिसंबर 2022

सोमवती !!

 




सोमवती !!

नायाब चीज अनदेखी नहीं कर सकती।
न ही करनी चाहिए।
साइट्स पर यूँ तुम जाने कब !!
कविता बन जाती हो !!!
कुदरती गुलाबी रंग सी ख़ुशी बेदाम ...
मदिरामय होंठों की बेशकीमती चुंबन ...
तुम में खूबसूरती बेभाव, भाव छल से परे,
पर दास्तान सरीखे ...
पूस में अलाव, कहवा या कहरवा ...
समझाओ ना, मुझे,
कौन हो तुम सोमवती??
- निवेदिता दिनकर
20/12/2022

बुधवार, 7 दिसंबर 2022

चाँद पर जाएंगे ...

 



चाँद पर जाएंगे ...

खूबसूरत चेहरे मुझे बेइंतेहा पसंद हैं |
आलिशान घर, बगीचे, रोशनी से नहाया घर ...
चमचमाती गाड़ियां, ओह हो हो हो ...
तिस पर विदेशी ...
तो फिर तो माशा ... आ आ ...
अल्लाह !!
वल्लाह !!!
बस ... अपनी आँखें सेंकती रहूँ ...
सेंकती रहूँ ...
'' बैठ मेरे पास, तुझे देखती रहूँ... देखती रहूं ''
वाला गीत हिल हिल हिलोरे मारने लगता है ...
पैलेस ऑन व्हील्स ...
डेक्कन ओडीसी लक्ज़री ट्रेन ...
से कम पर बैठने का कोई इरादा नहीं ...
हवाई यात्रा में
नो कैटल क्लास ...
ओनली बिज़नेस क्लास ...
अब तो विदेश यात्राएँ करने का भी कोई ख़ास मन नहीं है ...
या
तो चाँद पर जाएंगे ...
क्योंकि मार्स पर तो कब पानी न मिले तो !!!!
पर जब से ऐसी आर्टिकल्स पढ़ ली ,
‘अब मंगल पर बसेंगी मानव बस्तियाँ’,
‘पानी है तो मंगल पर जीवन भी अवश्य होगा-बस खोजना भर बाकी है’,
इत्यादि, इत्यादि।
तब से मन डुबुक डुबुक कर रहा है ...
क्योंकि अध्यात्म की पहली सीढ़ी यहीं से शुरू होती है ...
- निवेदिता दिनकर
०३/१२/२०२२
Photo : The Laxmi Niwas Palace, Bikaner, June 26, 2018,
Tuesday, 7:54 P:M

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

चाँद, तुम थकना नहीं ...





 चाँद, तुम थकना नहीं ...

खंडन करते है पर
अंतर्विरोध अविराम चलता है ...
फी फी कर हँसती हूँ, जब तब ...
देखो, क्या है कि हम फ़ितूरी लोग हैं
यह नाटक वाटक घोट कर पी चुके हैं, काफ़ी पहले
इश फिश करके तुम कुछ देर बात कर भी लोगे तो क्या..!!
अभी कई बार आओगे जाओगे ...
जैसे आती जाती हूँ,
मैं ...
बनारस !!
क्योंकि ठहरने का रिवाज़ नहीं है ...
- निवेदिता दिनकर
०१/१२/२०२०

बुधवार, 23 नवंबर 2022

परदा

 




परदा


पर्दे के आसपास,
पर्दे के नीचे,
पर्दे के पीछे,
पर्दे से,
पर्दे के अंदर,
पर्दे पर,
विगत पर्दा,
पर्दे के माध्यम से,
पर्दे के तले,
पर्दे के भीतर,

है
एक
सिसकती आत्मा ...
- निवेदिता दिनकर 

सोमवार, 21 नवंबर 2022

समुदाय




 समुदाय तो दो ही हैं।

१. इंसान दिखना
२. इंसान होना

- निवेदिता दिनकर
There are only two communities.
1. look human
2. being human

बुधवार, 9 नवंबर 2022

ईश्वर के प्रति मेरी आस्था चरम पर है/थी ...




 ईश्वर के प्रति मेरी आस्था चरम पर है/थी ...


सुबह शाम तुम्हारे सामने धूपबत्ती अगरबत्ती दीया का
इतना प्रभाव पड़ा ...
मेरे पूर्वजों पर,
कि कम से कम
मैं किसी दबे कुचले परिवार में पैदा नहीं हुई ...
अलबत्ता मेरे आसपास तो सब कुछ बहुत ही बढ़िया है ...
रसोई घर भरा हुआ,
अलमारियों में कपड़े,
कैश पूरा ...
बागानों में फूल उगाने के सारे साधन
जो फूल उगने में आनाकानी करते,
उन पर जोर जबरदस्ती कर जाते हुए कभी मलाल नहीं हुआ ...
गुमान की बूंदे टपर टपर गिरते उठते देखी जा सकती थी ...
सारे माध्यम हष्ट पुष्ट !!
सीरिया, रोहिंग्या, क्युबा, ईरान ...
में लड़कियों के साथ क्या हश्र हो रहा है ...
यह उनका परिवार देखेगा ...
दूर दिगंत में क्या हो रहा है ,
इसकी मुझे क्या ही दरकार है !!
जब एक बाप अपनी चौदह साल की बेटी को
दुल्हन बनने के लिए इसलिए मज़बूर करता है
क्योंकि
एक भूखा पेट कम हो जायेगा ...
बेरोज़गारी रेज़गारी देनदारी के तीन पाँच से अलग है दुनिया ...
यह दुनिया नक़्शे में नहीं पाये जाते ...
और न ही दिमाग़ के बक्से में ...
छत्तीस पन्नों में मात्र तीन पन्नों में देश विदेश की ख़बर की अख़बार
बाकि तैंतीस पन्ने लबालब खर्चे करने तरीक़े ...
लब्बोलुआब यह
कि देखकर सिहरन नहीं होती अब ...
सिहरन तो किसी बात से नहीं होती ...
कांच पर धूल तो जमते रहते हैं,
आंखों पर पट्टियां बाँधी जाती है/ रहेंगी ...
दुल्हन और वेश्यालय में कोई फर्क नहीं ...
इस बात का अब ईश्वर को भी कोई फर्क नहीं ...
- निवेदिता दिनकर
०९/११/२०२२