बुधवार, 29 अगस्त 2018

कुछ लोग कभी जाते नहीं ...




चाय की चुस्कियों में
और
महफ़िलों की चुप्पियों में ठहरे रह जाते हैं।
वे घास पर पड़े बारिश के
वह
बूढ़े बूँद है
जो धूप निकलने पर भी ठहरे मिलते है।
तकिये पर पड़े तेल के निकम्मे निशान कभी भी जा पाएं?
और
कंप्यूटर टेबल
पर
बेतरतीब आड़े तिरछे लहराते डिटेल्स
शिराओं में सिरिंज का काम करते हैं।
कुछ लोग कुहूकते रहें...
कुछ लोग कभी न जाए... -
- निवेदिता दिनकर

फोटो क्रेडिट्स : दिनकर सक्सेना , लोकेशन: लेह 



रविवार, 22 जुलाई 2018

एक माँ का सपना



दोस्तों, अर्ज़ है, पोस्ट् आखिर तक पढ़े ...
बिटिया का बी टेक में एडमिशन हो गया है , कंप्यूटर साइंस ब्रांच में |
यह बेहद ख़ुशी की बात है | हम बहुत ही प्रसन्न है |
२०१७ में उ प्र बोर्ड से ७६ प्रतिशत नंबर , फिजिक्स , केमिस्ट्री , मैथमेटिक्स लेकर, बिलकुल भी आसान नहीं | वह भी कोचिंग, टूटोरियल के बिना, अपने दम पर | वैसे कोचिंग लेना कोई बुरी बात नहीं , पर कुछ घर की मजबूरियों के चलते नहीं बन सका | समय समय पर बच्चों से संपर्क बनाये रखना ज्यादा जरूरी है सो मोटिवेशन, बातचीत का जरिया लगातार चलता रहा |
अच्छे नम्बरों की वजह से उ प्र सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप भी मिल गया |
वैसे तो २०१७ में भी बी टेक में एडमिशन मिल जाता, मगर इंजीनियरिंग डिप्लोमा में दाखिला लेना पड़ा | इलेक्ट्रिकल में | कमाल की बात यह रही कि कॉलेज के सारे ब्रांचेज में, फर्स्ट सेमेस्टर में बिटिया ने ही टॉप किया |
तो इस साल ठान लिया गया किअब बस |
बी टेक के दाखिले के लिए ... और मशक्कत रंग लायी , आगरा के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में आखिरकार दाख़िला मिल गया |
बिटिया की माँ यानि मेरी गृह कार्य सहायिका का सर गर्व से ऊँचा और साथ उसका पूरा परिवार बेहद खुश और निश्चिन्त |
शुरुआती रुपये पैसे , जो भी लगे , दे दिए गए है | एक नेक काम ऐसा हमसे हो पाया , हम इसके लिए ऊपर वाले और सारे शुभचिंतको का दिल से आभार प्रकट करते है |
इस घटना से मन फूला नहीं समां रहा है ... एक माँ का सपना सच होते देख कर ...

- निवेदिता दिनकर
  २१ /०७/२०१८

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

धूप







रेंगते हुए उतरता धीरे-धीरे वह कतरा धूप का,
दरख्त के ऊपरी छोर से बिन आहट के,
हल्के नीले आसमां का रंग भी बदला बदला,
बादलों के टुकड़ों ने भी रंजिशें कर लीं है
और
मैं खयालातों के नरगिसी बगीचें में
'अपने'
साथ खिल खिल हँस रही हूँ।
शिराओं से दर्द भी उतरता जा रहा है
मंद मंद ...
बिल्कुल गर्भ से शिशु के बाहर आने सा...


- निवेदिता दिनकर

रविवार, 8 जुलाई 2018

पुरसुकून




एक रेत के टीलें को मैंने चुन लिया था
दूर दूर तक बेतरतीब उभार ...
नक्काशी दार ...
सांय सांय करती उन्मादी हवाएँ ,
जिनको होश ही नहीं था
किधर मुड़ना है?
मेरी आवारा धड़कने
भी
धक् धक् गूँज रही थी |
आज एक मन्नत को पूरा होते देखा
रूही कंदराएँ
नज़्म नज़्म हो रही थी ...

- निवेदिता दिनकर
०३/०७/२०१८
तस्वीर : थार मरुस्थल , जैसलमेर 

सोमवार, 18 जून 2018

सूखी लकड़ी











मैंने पिता को साइकिल चलाकर दफ्तर से लौटते हुए ही देखा, 
कब जाते ?

ध्यान ही नहीं दिया  ... 

मुझे उस दिन रोना था , " बापी "
जब उस शाम आप दफ्तर से परेशां घर आये थे 
फिर आप और माँ अपने दर्द को बड़ी मुस्तैदी से छिपा गए   ... 

मुझे उस दिन भी रोना था ,
जब बैंक के उस अकाउंटेंट ने मुझसे कहा था 
" इनको बैंक के काम मत देना , भूल जाते है "

पर मुझे उस दिन भी रोना नहीं आया 
जब आपको ' डिमेंश्या ' बताया  गया  
आप निर्बोध बालक से सुनते रहे ...

कागज़ कलम लेकर मैं आपको 
आपका पुराना दस्तख़त दिखा रही थी 
आप उसे भी पहचान नहीं पाए  ...  

चीख़ चीख़ कर रोना था , नहीं रोयी  ... 
मुझे रोना तो था ही नहीं   ... 

आपको दो लोग देखने आये थे 
दोनों आपसे उम्र में बड़े थे 
क्यों मेरे मन में आया कि आप ही क्यों ?

देखते देखते 
एक के बाद एक तीनों ने रुख्सत ले लिया  ... 
एक बार भी नहीं चौंकी  ... 

बस भभकती रही अंदर ही अंदर  ...

कब सूखी लकड़ी बनती गयी ?
कब ?
आपके डाल की सूखी लकड़ी ...

जल तो सकें पर कोई मोड़ न सकें  ... 

- निवेदिता दिनकर 
  १८/०६/२०१८ 

गुरुवार, 14 जून 2018

कच्ची है ...















कुछ दोपहरी कविताएँ... रात भेदती हुईं  ... 
कुछ सपाट सन्नाटें  ... कपाट चीरती हुईं  ... 

बेहद कच्ची है , साहिब ...

 ढह सकतीं है |
 
- निवेदिता दिनकर 
  १४/०६/२०१८ 

  सन्दर्भ : यह तस्वीरें बेहद नाज़ुक है | इनको संभाल के पढ़ियेगा | आगरा के कछपुरा गाँव के पास टूरिज्म का उत्थान के लिए कंस्ट्रक्शन में हाथ बंटाती यह सखियाँ , इनका अतुल्य परिचय इतिहास क्या सहेज पायेगा  ...  

#साइटडायरीज 












शुक्रवार, 8 जून 2018

साधारण सी बात




मीटिंग देर तक चली थी | दोपहर के दो बजने को आये थे |  भूख हावी होने लगी थी | दिल्ली के कुछ ऑफिशियल्स भी साथ थे | सोचा गया पहले लंच कर लिया जाये | चोखो जीमण , जो राजस्थानी व मारवाड़ी भोजन के लिए प्रसिद्ध है, के लिए जाया गया | नमकीन छांछ से शुरुवात कर खीर रसगुल्ले पर क्षुधा समाप्त हुई |  
जब बाहर निकल के आये, तीन बज चुके थे | धूप अपने पूरे होशोहवास पर और जून के मौसम पर पूर्ण रूपेण अधिकार जमाये हुए | बाहर खड़े होकर लास्ट मिनट टॉक्स चल ही रही थी , तभी एक सज्जन पास आकर खड़े हुए | उम्र लगभग पचहत्तर - अस्सी के आसपास | पूछने लगे , रेलवे स्टेशन कितनी दूर है ? मैंने बताया ही था कि बस थोड़ी दूरी पर, कि अचानक निगाह गयी सज्जन के पीछे खड़े उनकी पत्नी पर |  झुकी हुई कमर , हाथ में लाठी , सफ़ेद प्रिंटेड धोती | पूछने लगीं अभी भी दूर है ? इस पर मैंने कहा, नहीं , ज्यादा नहीं | पर मुझे लगा कि पत्नी को चलने में शायद कठिनाई हो रही है | तो मैंने तुरंत एक रिक्शे वाले को आवाज़ लगायी और कहा कि इन्हें स्टेशन तक छोड़ आओ और उसकी मुठ्ठी में तीस रूपए रख दिए, जबकि दूरी महज दस रूपए की ही थी | सज्जन ने बड़ी विनम्रता से कहा , इसकी जरूरत नहीं , पैसे है | मैंने कहा, नहीं, बाऊजी , आप रिक्शे में बैठ जाइये | अम्माजी ने आँखों ही आँखों में बहुत कुछ कहा , जो मेरे दिल ने सुन ली थी | 

जैसे ही  रिक्शा थोड़ी दूरी  पर गया , एक ऑफिस कुलिग ने कहा , आप ने रिक्शा वाले को पैसे दे दिए , अब वह वहां पहुँचाकर , उन लोगो से भी पैसे माँगेगा | आपको रिक्शा वाले को बता देना चाहिए था कि पैसे न माँगे | 
 मैंने कहा , मेरे से नहीं कहा गया | ऐसा कहकर मैं रिक्शा वाले को शर्मिंदा नहीं कर सकती थी | यह तो साधारण सी बात है कि पैसे उसे नहीं लेने चाहिए | क्या इतना भरोसा भी एक इंसान दूसरे इंसान पर नहीं कर सकता ? केवल इसलिए कि वह रिक्शा चलाता है ? 

जैसे मुझे अच्छा लगता है , जब मुझ पर भरोसा किया जाता है | 

- निवेदिता दिनकर    
  ०८/०६/२०१८  

चित्र : वृन्दावन की गली की  सहजता,  गलियों के अवलोकन के दौरान