गुरुवार, 15 जनवरी 2015

स्पर्श





एक अजीब सा रूहानी रूमानी एहसास।
दबी दबी ढकी ढकी।
सड़को पर चलते आहटों की आवाज़।
दूर जलती मद्धिम रौशनी। 
बारिश की बूंदो से 
उजली चमकती पत्तियाँ … 
और 

स्पर्श करते उष्ण हाथ।

- निवेदिता दिनकर 
 १४/०१/२०१५ 

तस्वीरों  को आज शाम क़ैद करते वक़्त मन को स्पर्श करते कुछ यूँ ख्याल  … 
लोकेशन - मेरे घर के सामने   


स्पर्श





एक अजीब सा रूहानी रूमानी एहसास।
दबी दबी ढकी ढकी।
सड़को पर चलते आहटों की आवाज़।
दूर जलती मद्धिम रौशनी। 
बारिश की बूंदो से 
उजली चमकती पत्तियाँ … 
और 

स्पर्श करते उष्ण हाथ।

- निवेदिता दिनकर 
 १४/०१/२०१५ 

तस्वीरों  को आज शाम क़ैद करते वक़्त मन को स्पर्श करते कुछ यूँ ख्याल  … 
लोकेशन - मेरे घर के सामने   


मंगलवार, 13 जनवरी 2015

लपट



सोचा कुछ लिखे,
हर कोई तो लिख रहा है।  
धत,
कोई शब्द 
आने को तैयार ही नहीं। 
इतना धधक रहा … 
सब कोयला कर दे रहा है।  
जैसे ही छूने की कोशिश किया,  
उंगली जला दिया …  
शब्द शब्द अंगार 
तेज लपट 
धू धू कर जल रहा … 

अब क्या ख़ाक लिखूँ !!

- निवेदिता दिनकर 
   १३/०१/२०१५   

फोटो क्रेडिट्स उर्वशी दिनकर , लोकेशन घर की छत , ३१ दिसम्बर २०१४ की रात, आगरा  
नोट : गौर से देखिए, फोटो में 'लपट ने एक औरत का रूप लिया है।' 

रविवार, 11 जनवरी 2015

सपनें


चूल्हों में जलती 
बैंगनी नारंगी रंग
और 
ऊपर पकती दाल 
सौंधी सी … 
भाव बहे जाये बदरंग 
और 
करवटें लेती सपनें 
औंधी सी … 

- निवेदिता दिनकर 

तस्वीर साभार गूगल 

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

असम




असम के बारे में न्यूज़ देखते देखते मन रुआँसा हो गया। कौन है यह बोडो ? क्यों चाहिए बोडो लैंड ?
कितने नरसंहार और कब तक ? इन लोगों की आत्मा जागती नहीं ? क्या यह मनुष्य नहीं ? क्या गरीबी मूल कारण  है ? या निरक्षरता या बेरोजगारी या कोई कलुषित राजनीति ? 
एक रणवीर सेना भी हुआ करती थी , ताबड़तोड़ गोलियाँ , कुछ दिन अखबारों की सुर्खियां फिर एक और काले दिन का इंतज़ार । 
अब इतने कलियट तो हो गए है कि पहचानना भी मुश्किल। 
अब तो काली स्याह रात को भी पीछे छोड़ दिया, दानवों । 

- निवेदिता दिनकर 
  २७/१२/२०१४     
तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से "अलमस्त" , लोकेशन भीमताल 

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

कभी-कभी

कभी कभी ख़ुशी का कारण भी बनना, कितना सुखदायक होता है, न। 
आज फूटपाथ पर फेरी लगाकर बैठने वाले से जब मैंने ऊनी दस्ताने ख़रीदे या जब पैसे देने की जगह उस पतले दुबले मुरझाये को खाना खिलवाया या जब संतरे वाले के कहने मात्र पर जबरदस्ती संतरे खरीदे। . 
वैसे कहीं कुछ ख़ास तो नहीं हुआ सिवाय उन लोगों के चेहरें की चमक को छोड़ कर। 
ऐसी कड़ाके की सर्दी में गरम गुलाबजामुन सी गरमाहट बड़ी सोणी लगती है.... 

- निवेदिता दिनकर
  25/12/2014

तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से क्रिसमस ट्री लोकेशन 'अपना घर'

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

धुंध


धुंध से फैलती नारंगी रौशनी
सचमुच 
कितनी तिलस्मी, 
कितनी अपरूप,  
कितनी कातिलाना, 
मानों 
तेरे प्यार की सुलगती खुशबू 
मेरे साँसों में आ जा रही है  … 
उफ्फ, 
आज की रात !
आज की ठंडी रात !!

- निवेदिता दिनकर
  २४/१२/२०१४  

तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से 'धुंध भरी रात' लोकेशन आगरा