गुरुवार, 15 जनवरी 2015
मंगलवार, 13 जनवरी 2015
लपट
सोचा कुछ लिखे,
हर कोई तो लिख रहा है।
धत,
कोई शब्द
आने को तैयार ही नहीं।
इतना धधक रहा …
सब कोयला कर दे रहा है।
जैसे ही छूने की कोशिश किया,
उंगली जला दिया …
शब्द शब्द अंगार
तेज लपट
धू धू कर जल रहा …
अब क्या ख़ाक लिखूँ !!
- निवेदिता दिनकर
१३/०१/२०१५
फोटो क्रेडिट्स उर्वशी दिनकर , लोकेशन घर की छत , ३१ दिसम्बर २०१४ की रात, आगरा
नोट : गौर से देखिए, फोटो में 'लपट ने एक औरत का रूप लिया है।'
रविवार, 11 जनवरी 2015
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
असम
असम के बारे में न्यूज़ देखते देखते मन रुआँसा हो गया। कौन है यह बोडो ? क्यों चाहिए बोडो लैंड ?
कितने नरसंहार और कब तक ? इन लोगों की आत्मा जागती नहीं ? क्या यह मनुष्य नहीं ? क्या गरीबी मूल कारण है ? या निरक्षरता या बेरोजगारी या कोई कलुषित राजनीति ?
एक रणवीर सेना भी हुआ करती थी , ताबड़तोड़ गोलियाँ , कुछ दिन अखबारों की सुर्खियां फिर एक और काले दिन का इंतज़ार ।
अब इतने कलियट तो हो गए है कि पहचानना भी मुश्किल।
अब तो काली स्याह रात को भी पीछे छोड़ दिया, दानवों ।
- निवेदिता दिनकर
२७/१२/२०१४
तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से "अलमस्त" , लोकेशन भीमताल
गुरुवार, 25 दिसंबर 2014
कभी-कभी
कभी कभी ख़ुशी का कारण भी बनना, कितना सुखदायक होता है, न।
आज
फूटपाथ पर फेरी लगाकर बैठने वाले से जब मैंने ऊनी दस्ताने ख़रीदे या जब
पैसे देने की जगह उस पतले दुबले मुरझाये को खाना खिलवाया या जब संतरे वाले
के कहने मात्र पर जबरदस्ती संतरे खरीदे। .
वैसे कहीं कुछ ख़ास तो नहीं हुआ सिवाय उन लोगों के चेहरें की चमक को छोड़ कर।
ऐसी कड़ाके की सर्दी में गरम गुलाबजामुन सी गरमाहट बड़ी सोणी लगती है....
- निवेदिता दिनकर
25/12/2014
तस्वीर उर्वशी दिनकर के सौजन्य से क्रिसमस ट्री लोकेशन 'अपना घर'
बुधवार, 24 दिसंबर 2014
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