शनिवार, 14 जून 2014

लहर


उफ्फ...
यह लहर, 
फिर लहर, 
और 
फिर एक लहर... 
हर पहर

लहर लहर...
आत्म मुग्ध
यह लहर...
क्षण भंगुर
है लहर,
फिर भी
लहर लहर... 


- निवेदिता दिनकर

शुक्रवार, 13 जून 2014

आँधी


आँधी के साथ एक जूनून, नहीं शायद एक मिटटी का एहसास, कह रही हो 
सब एक दिन धूल हो जाना है । 
मैंने कहा, ऐसे कैसे ?
अभी अंदर की "आँधी" का आना बाक़ी है, दोस्त॥


- निवेदिता दिनकर

शुक्रवार, 6 जून 2014

अकेले





वह प्रेम ही क्या, जहाँ ईर्ष्या न हो!!

इस बार जब तुम आना ,
अकेले ही आना,
बस अकेले … 
न कोई गल्प, 
न कोई परी कथा, 
न साजो सामान, 
न वीर गाथा,
बस अकेले … 

बस तुम …

मुझे ईर्ष्या जो होती है ॥ 



- निवेदिता दिनकर 

गुरुवार, 5 जून 2014

यूँ ही



एक कोने में बैठकर,
निहारती रही,
पूरे कमरे में 
तुम बिखरे हुए हो … 
खूँटी में, 
जहाँ तुम्हारी शर्ट टंगी है, 
चादर की सिलवटों में,
चौकी पर 

जहाँ बैठकर जूते के फिते बांधे,
जमीन पर फैले
शीशे के टुकड़ों में …
चाह कर भी
नहीं समेट पायी
और
रहने दिया
यूँ ही सब कुछ
हमेशा हमेशा के लिए
ज़हन की रफ़्तार में॥ 


- निवेदिता दिनकर

मंगलवार, 3 जून 2014

देख माँ

मन द्रवित हो रहा है, जबसे बच्चियों के बारे में पढ़ा है ...

देख माँ, 
नहीं जाना चाहती मै … 
तुझे छोड़ कर, 
बहुत रोयेगी तु
यह जानकर, 
बिन मेरी गलती पर,
मुझे यह सज़ा दिये जाने पर … 

बहुत रोयेगी तु
यह जानकर,

देख माँ,
बहुत दर्द हो रहा है न,
तुझे छोड़ कर,
मैं भी बहुत रोयी हूँ
यह जानकर,

मगर माँ,
तु अब एक काम कर,
मेरा जाना न ज़ाया कर,
एक एक को पकड़,
उनके किये की सज़ा देकर,
ही बैठना तु …
यह जानकर …

उनके किये की सज़ा देकर,
ही बैठना तु …
यह जानकर … 

- निवेदिता दिनकर 

बुधवार, 21 मई 2014

वह भीगी रात


कितनी खूबसूरत बात है, 
कितनी मनमोहक रात है, 
मन करता है … 
रोक लू इसे, 
न जाने दू कभी ,
यु ही तुम्हारे 
साथ… 
स्पर्श की आंखमिचौली,
खुशबूओं की होली …  
सिहरन का आलिंगन, 
कौंधती बिजली सा बदन  …  
दर सिलसिला 
बना रहे 
और 
हम 
कभी बाहर 
न निकल पाये ॥  

काश, तुम समझ पाते!!

- निवेदिता दिनकर 

शुक्रवार, 2 मई 2014

मेरा अभिमान

"मेरा अभिमान" यानि मेरी पुत्री रत्ना "उर्वशी" को ढेर सारा प्यार और स्नेह, १५ वीं वर्षगांठ पर … 

जब से तुम्हें पाया,
मायने ही बदल गए … 

जिंदगी की प्यास 
झिलमिल सी आस,
झर झर बातें,
कितना हर्षाते … 
चमचमाती सोच,

एक निर्मल स्रोत …
आकाश का सितारा,
मेरी आधारशिला …
मेरा गुमान,
मेरा अभिमान …

ऐसे जैसे,
जगत के सारे आनंद …
हमेशा हमेशा के लिए ,
मेरी बाबड़ी में आ गए …

जब से तुम्हें पाया,
मायने ही बदल गए …
मायने ही बदल गए …


- निवेदिता दिनकर